कविता

भौंकते कुत्ते

उस दिन के काम से
फुर्सत हो जैसे ही मैं घर आया,
तुरंत गली के एक कुत्ते से टकराया,
वो भौंकता हुआ मेरे मकान में आया,
दरवाजा खटखटाया,
बोला काफी देर से मैं आपको
भौंक भौंक चिल्ला रहा हूं,
आपको भिया भिया कह बुला रहा हूं,
आप मोबाइल में व्यस्त हैं,
उधर गली के लोग और कुत्ते
बोर के पानी के लिए त्रस्त हैं,
इस मोहल्ले में रहना है तो सोच समझ कर रहिए,
हमें आदरपूर्वक कुत्ता जी कहिए,
दरअसल वो मेरे मकान मालिक का गुस्सा
मेरे ऊपर उतार रहा था,
जो कुछ सालों से उसे हड्डी नहीं डाल रहा था,
उनकी आर्थिक प्रगति से वो हलाकान था,
कुढ़ कुढ़ कर अत्यधिक परेशान था,
मुझे गुस्सा तो बहुत आया,
मगर मैंने अपने आप को समझाया,
कि कुत्ते का मुंह लगना ठीक नहीं है,
ये वो कुत्ता नहीं जिसमें रेबीज नहीं है,
ये जहां भी दिखे दुत्कारकर भगाइये,
उस कुत्ते को उनकी
कुत्तानियत वाली औकात दिखाइये,
यहां कुत्ता का मतलब एक इंसान हैं,
जो कर्मचारियों के अधिकारों से अंजान है।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554

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