भाषा-साहित्य

देवेन्द्र माँझी का साहित्यिक अवदान: एक विस्तृत विवेचन

समकालीन हिंदी और उर्दू साहित्य के परिदृश्य में देवेन्द्र माँझी एक अत्यंत सशक्त, बहुमुखी और प्रतिष्ठित हस्ताक्षर हैं। देवेन्द्र माँझी जी का रचना-संसार बहुत व्यापक है। उन्होंने ग़ज़लों के साथ-साथ गीत, दोहे और गद्य (उपन्यास) भी लिखे हैं, जिसमें उनके गहन चिंतन और उदात्त मानवीय बोध की सार्थक उपस्थिति दिखाई देती है। एक रचनाकार के रूप में उनका सबसे बड़ा गुण उनकी संवेदनशीलता और समाज के प्रति उनकी गहरी जवाबदेही है। साहित्य के प्रति उनके समर्पण का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि वे अब तक अपनी 30 पुस्तकें (कृतियाँ) हिन्दी साहित्यिक-समाज को प्रदान कर चुके हैं। इसके अलावा आपकी चार कृतियाँ  उर्दू लिपि में भी प्रकाशित हुई हैं। इसके अतिरिक्त, उन्होंने अपने दौर के मशहूर शायरों की चुनिंदा शायरी पर आधारित आठ पुस्तकों का सफल संपादन भी किया है।
उनका साहित्यिक अवदान केवल कविता या गद्य तक सीमित नहीं है, बल्कि तुकान्तकोश, शब्दकोश और मुहावराकोश के निर्माण में भी ऐतिहासिक और अद्वितीय योगदान रहा है। देवेन्द्र माँझी के संपूर्ण साहित्यिक अवदान को हम उनकी रचना-विधाओं के आधार पर निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत समझ सकते हैं:
1. ग़ज़ल साहित्य में यथार्थ और संवेदना का स्वर : देवेन्द्र माँझी मूलतः मुहब्बतों और मानवीय संवेदनाओं के शायर हैं। लगभग चार दशक पूर्व उनका पहला ग़ज़ल-संग्रह ‘समंदर के दायरे’ प्रकाशित हुआ था, जिसने साहित्य-प्रेमियों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था। इसके पश्चात उनकी ग़ज़लों के कई महत्त्वपूर्ण संग्रह प्रकाशित हुए, जिनमें ‘नगर करायेगा विषपान मुझे’, ‘शीशे का इन्क़िलाब’, ‘हादिसा हूँ मैं’, ‘क्यों सभी ख़ामोश हैं’, ‘मजबूरियां मेरी’, ‘इशारे हवाओं के’, ‘ये रोशनी मेरी नहीं’ और ‘मैं ही मौक़ा हूँ’ प्रमुख हैं।
उनकी ग़ज़लें अपने समय और आबो-हवा की ख़ुशबू से लबरेज़ हैं। उनमें समाज के जटिल यथार्थ को ईमानदारी और बेबाकी से व्यक्त करने की अद्भुत क्षमता है। माँझी जी की ग़ज़लों में जहाँ एक ओर रोमानी पहलू, प्रेम, विरह, अकेलेपन और उदासी के गहरे रंग हैं, वहीं दूसरी ओर ज़िंदगी के प्रति एक शिकायत भरा स्वर भी मौजूद है, जिसके भीतर आशा और विश्वास की झंकार सुनाई देती है। वे मानते हैं कि ‘आँसू’ किसी भी कवि या साहित्यकार के लिए उपकरण का कार्य करते हैं, जिसने उन्हें निखारा है।
उनकी ग़ज़लों में जीवन के कठोर और खुरदरे यथार्थ का चित्रण है। वे आम आदमी की समस्याओं, राजनीतिक विद्रूपताओं और उच्च-वर्गीय समाज द्वारा निम्न-वर्गीय लोगों के शोषण को अपनी शायरी का विषय बनाते हैं। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. शेरजंग गर्ग के अनुसार, माँझी जी ने अपनी ग़ज़लों को आत्मीयता की पोशाक में सँवारकर पेश किया है और ज़िंदगी के वास्तविक पहलुओं से सीधा रिश्ता कायम किया है।
2. ‘मक़्ते’ में तख़ल्लुस का अद्वितीय और प्रतीकात्मक प्रयोग : उर्दू-हिंदी ग़ज़ल परंपरा में मक़्ते (ग़ज़ल का अंतिम शे’र) में शायर के तख़ल्लुस (उपनाम) का प्रयोग एक सामान्य बात है, लेकिन देवेन्द्र माँझी ने अपने उपनाम ‘माँझी’ का जिस कौशल और कलात्मकता के साथ प्रयोग किया है, वह विस्मयकारी है। उन्होंने ‘माँझी’ शब्द को नदी, तूफ़ान, नाव, भँवर, दरिया, समंदर, लहर, तट, रवानी, कश्ती और पतवार जैसे शब्दों के साथ रूपकों में ढालकर बला की ख़ूबसूरती पैदा की है।
वे अपने तख़ल्लुस के माध्यम से लहरों, साहिलों और तूफ़ानों से खेलते, जूझते और उन्हें चुनौती देते हुए नज़र आते हैं। डॉ. शेरजंग गर्ग ने उनके इस मक़्ता-प्रयोग की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए कहा है कि पूर्ववर्ती या समकालीन पीढ़ी के अनेक शायरों ने तख़ल्लुस रखे, मगर अपने उपनाम का इतना सटीक और सार्थक अंदाज़ कोई और नहीं दे पाया जैसा देवेन्द्र माँझी ने दिया है।
3. गीत और नवगीत: प्रकृति, प्रेम और दर्शन का त्रिवेणी संगम ग़ज़ल के साथ-साथ देवेन्द्र माँझी ने गीत और नवगीत विधा में भी अत्यंत उत्कृष्ट रचनाएँ की हैं। उनका संग्रह ‘हंस अकेला उड़ जाता है’ उनके गीतों की संरचनात्मक विविधता और वैचारिक गहराई का प्रामाणिक दस्तावेज़ है।
भारतीय सनातन परंपरा के अनुरूप माँ शारदे की वंदना से प्रारंभ होने वाले इन गीतों में राष्ट्रभक्ति, प्रेम, शृंगार और जीवन के दार्शनिक पहलुओं का अद्भुत चित्रण है। वे स्वयं को ‘तुलसी का वंशज’ और ‘फक्कड़ कबीर की पद-रज’ मानते हैं और जीवन में सत्य बोलने की शपथ लेते हैं। उनके गीतों में जीवन-संघर्ष के सत्य को उजागर किया गया है, जहाँ वे मानते हैं कि बिना सींचे और सँवारे उपवन में फूल नहीं खिलते।
माँझी जी के गीतों में शृंगार-रस से सराबोर अनुपम रचनाएँ हैं (जैसे ‘चाँदनी की देह को चूमा करूँ’) और साथ ही आधुनिक काल के निरुद्देश्य जीवन पर गहरा कटाक्ष भी है। वे मानव जीवन की नश्वरता को समझाते हुए लिखते हैं कि यह देह एक दुर्लभ खिलौना है जो एक दिन टूट जाता है और ‘हंस अकेला उड़ जाता है’। उनके गीतों में प्रतीकों और उपमानों का जादुई प्रयोग हुआ है, जो पाठक को भाव-विभोर कर देता है। अब उनके गीतों का नया संग्रह “हम तुम सब कस्तूरी मृग हैं” जल्दी ही पाठकों के हाथों में आने वाला है।
4. दोहा साहित्य: सामाजिक विसंगतियों और यथार्थ का दर्पण देवेन्द्र माँझी का दोहा-संग्रह ‘झुकी पीठ पर बोझ’ उनके साहित्यिक अवदान का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। उनके दोहों का कथ्य मुख्य रूप से ग़रीबी, रिश्ते-नाते, झूठ, छल-कपट, शोषण, वेश्यावृत्ति, संवेदनहीनता और राजनीतिक विद्रूपताओं से जुड़ा है।
वे मानते हैं कि मनुष्य के जीवन में ग़रीबी सबसे बड़ा अभिशाप है, जो उसे मजबूर कर देती है। उनके दोहे आम आदमी की उस पीड़ा को स्वर देते हैं जहाँ एक मज़दूर खाली पेट सोने को विवश है और एक भूखी माँ के सूखे स्तनों को चूसकर बच्चा बिलख रहा है।
माँझी जी ने ग़रीबी के कारण उत्पन्न होने वाली अनैतिकता और देह-व्यापार में फँसी लड़कियों की व्यथा-कथा को भी अपने दोहों में अत्यंत मार्मिक ढंग से अभिव्यक्त किया है। समाज में पनपते पाखंड, पुलिस और अपराधियों की मिलीभगत और सत्ता के खेल पर उनके दोहे तीखा प्रहार करते हैं। उनका दोहा साहित्य समाज के उस कुरूप चेहरे को सामने लाता है जिसे अक्सर चकाचौंध के पीछे छिपा दिया जाता है।
5. विश्व का सबसे बड़ा तुकान्तकोश और मात्रिक उर्दू-हिंदी कोश :  कविता और साहित्य सृजन के अतिरिक्त देवेन्द्र माँझी का सबसे बड़ा, ऐतिहासिक और शोधपरक अवदान उनके द्वारा निर्मित कोश (Dictionaries) हैं। उन्होंने ‘विश्व का सबसे बड़ा और सम्पूर्ण तुकान्त-कोश’ (अद्भुत लयात्मक शब्द-सागर) तैयार किया है, जिसे ‘इण्डिया बुक ऑफ़ रिकॉर्ड’, ‘एशिया बुक ऑफ़ रिकॉर्ड’, ‘वंडर बुक ऑफ़ रिकॉर्ड ऑस्ट्रेलिया’ और ‘इंटरनेशनल बुक ऑफ़ रिकॉर्ड’ से सम्मानित किया जा चुका है। लगभग दो हज़ार पृष्ठों का यह ‘माँझी तुकान्त कोश’ (दो खंडों में) नवोदित और स्थापित दोनों प्रकार के कवियों और शायरों के लिए एक वरदान है।
इसके साथ ही, ग़ज़ल लिखने और कहने वालों के लिए विशेष रूप से उन्होंने ‘मात्रिक उर्दू-हिंदी कोश’ (खंड 1 और 2) का निर्माण किया है। लगभग पंद्रह सौ पृष्ठों के इस महाग्रंथ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें प्रत्येक शब्द की तक़्तीअ (मात्रा-भार) सहित जानकारी दी गई है। साहित्य के क्षेत्र में, विशेषकर ग़ज़ल के तकनीकी पक्ष (बहर और वज़न) को सुगम बनाने के लिए किया गया यह भगीरथ प्रयास देवेन्द्र माँझी को हिंदी-उर्दू साहित्य के चंद सबसे समर्पित विद्वानों की श्रेणी में खड़ा कर देता है।
6. भाषा-शैली, प्रतीक और मिथकों का प्रयोग : माँझी जी की भाषा अत्यंत सहज, संप्रेषणीय और लोकोन्मुखी है। उन्होंने अपनी बात कहने के लिए उर्दू-हिंदी के साथ-साथ आवश्यकता पड़ने पर अंग्रेज़ी शब्दों (जैसे- ग्राफ, ई-मेल, इंटरनेट, गूगल) का भी बेझिझक और सटीक प्रयोग किया है।
उनके साहित्य में उपमा-उपमेय विषयक शब्द-प्रतीकों का अनूठा विधान है। वे अपनी ग़ज़लों और गीतों में पौराणिक मान्यताओं, परम्पराओं और कथाओं का अद्भुत तरीके से प्रयोग करते हैं। उनके काव्य में राम, सीता-हरण, रावण, शंकर (शिव), सुकरात, नरसी का भात, द्रोपदी और अहिल्या जैसे मिथकों और संदर्भों का प्रचुर प्रयोग मिलता है, जो आधुनिक राजनीतिक और सामाजिक संदर्भों में बिल्कुल सटीक बैठते हैं। इसके अतिरिक्त लोक-जीवन के मुहावरों—जैसे “ऊँट पहाड़ के नीचे”, “ओखली में सिर देना”, “एड़ियाँ रगड़ना”—का प्रयोग उनकी भाषा को मिट्टी की सौंधी महक से जोड़ देता है।
देवेन्द्र माँझी का साहित्यिक अवदान मात्र कुछ पुस्तकों के प्रणयन तक सीमित नहीं है। वे एक ऐसे रचनाकार हैं जिन्होंने जीवन के धूप-छाँव, सुख-दुःख और संघर्ष को अपनी चेतना में आत्मसात किया और उसे पूरी ईमानदारी के साथ काग़ज़ पर उकेरा। वे ‘सच्ची रोशनी’ के पैरोकार हैं जो झूठी चकाचौंध और स्वार्थ का अंधकार मिटाना चाहती है।
गीत-नवगीत की भावप्रवणता हो, ग़ज़लों की मारकता हो, दोहों की खरी-खोटी सामाजिक समीक्षा हो या फिर भावी रचनाकारों के लिए ‘तुकान्त कोश’ और ‘मात्रिक कोश’ जैसा श्रमसाध्य शोध कार्य—देवेन्द्र माँझी ने हर मोर्चे पर अपनी लेखनी का लोहा मनवाया है। उनका साहित्य आम आदमी की चीख, समाज की विसंगतियों और मानवीय मूल्यों की पुनर्स्थापना का प्रामाणिक दस्तावेज़ है, जो हिंदी और उर्दू दोनों साहित्यों की अमूल्य निधि है।
 अपनी सत्तर वर्ष की उम्र में वे आज भी साहित्य-साधना में रत हैं और उनके पाँच उपन्यास प्रकाशन की देहलीज़ पर हैं। विशेष बात यह भी है कि देवेन्द्र माँझी पौराणिक चरित्रों पर भी बहुत-कुछ खोजपूर्ण और तथ्यपरक कृतियाँ जल्द ही साहित्यिक और धार्मिक समाज को देने वाले हैं।

— पूनम चतुर्वेदी

संस्थापक

न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन   

पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

संस्थापक-निदेशक न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन’ एवं अदम्य ग्लोबल फाउंडेशन ईमेल: Founder@SrijanSansar..com मोबाइल: +91-9312053330

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