भोर सुनहरी गाँव की
भोर सुनहरी गाँव की, जगती नई उमंग।
माटी की हर साँस में, बसता जीवन-रंग॥
सुबह-सुबह की नव किरण, चूमे भूमि भाल।
ओस नहाई दूब पर, बिखरे स्वर्णिम जाल॥
सूरज जैसे बाँटता, आशा के सत्संग—
माटी की हर साँस में, बसता जीवन-रंग॥
मुर्गे की मीठी बाँग से, जागे सारा गाँव।
मंदिर की घंटी कहे, प्रेम भरे सब भाव॥
गौशाला की गूँज में, गूँजे मंगल-ढंग—
माटी की हर साँस में, बसता जीवन-रंग॥
कुएँ की भू जगत पर, खनके माटी-घाट।
पनघट जाती पगध्वनि, रचती मधुर लय-पाट॥
हँसी बिखेरे हर डगर, जीवन बने तरंग—
माटी की हर साँस में, बसता जीवन-रंग॥
खेतों की हर मेड़ पर, उगती नई उमंग।
हल की रेखाएँ लिखें, श्रम का पावन संग॥
किस्मत बोता किसान जब, हँसता हर प्रसंग—
माटी की हर साँस में, बसता जीवन-रंग॥
पीपल की ठंडी छाँव में, चिड़ियाँ गाएँ गीत।
नदिया भी मुस्का उठे, सुनकर मधुर संगीत॥
प्रकृति करे हर रोज़ ही, जीवन का सत्संग—
माटी की हर साँस में, बसता जीवन-रंग॥
‘सौरभ’ गाँवों भोर है, सादगी भरा मान।
माटी, श्रम, अपनत्व से, महके हिन्दुस्तान॥
शहरों की चकाचौंध से, ऊँचा इसका रंग—
भोर सुनहरी गाँव की, जगती नई उमंग।
माटी की हर साँस में, बसता जीवन-रंग॥
— डॉ. प्रियंका सौरभ
