गीत/नवगीत

क्या आज़ादी अभी भी अधुरी है ?

१५ अगस्त कहता है हमसे
भाई-भाई में क्यों आज दूरी है,
एक दूजे के खून के प्यासे
कैसी अब यह मजबुरी है ;
क्या आज़ादी अभी भी अधुरी है ?

भ्रष्टाचार के पहियों तले
सढ़ती-गलती क्यों यह मशीनरी हैं ,
धन के नशे में धुत देश के
सभी बड़े-बड़े अधिकारी हैं ;
क्या आज़ादी अभी भी अधुरी है ?

आजादी के नाम डंका बजा
आज नंगी हमारी नारी हैं,
सदियों पुरानी संस्कृति की
कैसी यह विचित्र बीमारी है ;
क्या आज़ादी अभी भी अधुरी है ?

कहीं ससुराल में जलती बेटी
कहीं उसके सपनें सिन्दूरी हैं,
दहेज़ के ग्रास से त्रस्त समाज
कैसी जानलेवा यह महामारी है ;
क्या आज़ादी अभी भी अधुरी है ?

दर-दर भटकता नौजवान
न कहीं मिलती उसे नौकरी है ,
आज़ाद भारत वर्ष की आज
यह कैसी बेवसी और लाचारी है ;
क्या आज़ादी अभी भी अधुरी है ?

भेद की परिभाषा आज बदली है
लाल खून में परिवर्तन भारी है,
अनियंत्रित भूख से पीड़ित
क्यों आज यह सत्ता हमारी है ;
क्या आज़ादी अभी भी अधुरी है ?

इतने बरस गुजरे फि भी
वही घिनौनी गरीबी अमीरी है,
खोखले वायदों से हरबार
होती वोट की खरीदारी है ;
क्या आज़ादी अभी भी अधुरी है ?

— सुव्रत दे

सुव्रत दे

संपादक--हिन्दी-ज्योति, सेवा नर्सिंग होम के निकट , साखीपाड़ा, सम्बलपुर--768001 उडीसा। मो. 8457032905