ग़ज़ल
नयी कोई इबारत हो गयी क्या
खड़ी उम्दा इमारत हो गयी क्या
नहीं आता हैअक्सर इस तरफ अब
उसे कोई शिकायत हो गयी क्या
वही जिसका बहुत था ज़ह्न में डर
वही फिर से शरारत हो गयी क्या
दिखें टूटे मकां ही चार सू क्यूँ
कोई बरपा क़यामत हो गयी क्या
कभी गांधी भगत में थी बसी जो
वही पैदा हरारत हो गयी क्या
— हमीद कानपुरी
