भारत एक जाति आधारित समाज
भारत की जनसंख्या लगभग 148 करोड़ है। यह जनसंख्या धर्म, भाषा और संस्कृति के संदर्भ में विविधता से परिपूर्ण है। हमारा देश असंख्य जातियों और जनजातियों का भी घर है। भारत की जाति व्यवस्था सामाजिक स्तरीकरण की सबसे पुरानी प्रणालियों में से एक है। 21वीं सदी में भी भारतीय समाज में इसका अस्तित्व और संचालन इसकी अनुकूलनशीलता के कारण संभव हो पाया है।भारतीय सामाजिक व्यवस्था में जाति नामक एक विशिष्ट श्रेणी पाई जाती है, जो व्यवसाय-आधारित विशिष्ट समूह है। अंतर्विवाह (अपने समुदाय के भीतर विवाह) की प्रथा, जो जाति व्यवस्था का केंद्र है, जाति के घनिष्ठ संबंधों को और मजबूत करती है। यह सामाजिक स्थिति, विशेषाधिकार, प्रभुत्व और अधीनता के मामलों में जन्मजात स्थिति (जन्म के संयोग से निर्धारित) के आधार पर घटक समूहों का एक पदानुक्रम स्थापित करती है।भारतीय मुसलमानों में जाति व्यवस्था का कोई धार्मिक आधार नहीं है, लेकिन इसके बावजूद हर जगह जात-पात चलता है। यहां शादी-ब्याह अपनी ही जाति में की जाती है।यहां तक कि दूसरी जातियों के लड़के-लड़की से प्रेम और प्रेम विवाह के उदाहरण भी कम ही देखने को मिलते हैं। कई गांव कस्बों में अगड़े और पिछड़े मुसलमानों की अलग-अलग मस्जिदें होती है।कई जगह उनके कब्रिस्तान तक अलग होते हैं।एक ही गांव कस्बे में पिछड़े मुसलमान और अशराफ मुसलमानों के मोहल्ले अलग होते हैं।सभी अपनी-अपनी बिरादरी वाले इलाके में घर बनाना या खरीदना पसंद करते हैं।अगड़ी जाति के मुसलमान अपने धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षणिक संगठनों, संस्थाओं और समितियों में पिछड़े मुसलमानों को जगह नहीं देते हैं।यहां तक कि पिछड़े मुस्लिम उम्मीदवार को वोट करने से भी परहेज करते हैं। राज्यसभा के पूर्व सांसद अली अनवर अंसारी यहां तक कहते हैं कि अशराफ मुस्लिम नेताओं ने कभी भी पसमांदा मुसलमानों के कल्याण के लिए कोई काम नहीं किया।एक साजिश के तहत ऐसे नेताओं ने पसमांदा मुसलमानों को अनपढ़ और कमजोर बनाए रखा ताकि अकेले उनकी दुकानदारी हमेशा के लिए चलती रहे।समाजशास्त्र के प्रोफेसर डॉ सोहेल अख्तर कहते हैं,; रोजमर्रा की जिंदगी में भी पिछड़ी जाति के मुसलमान अशराफ मुसलमानों से भेदभाव और अपमानजनक टिप्पणियों को झेलते हैं। यहां बदजात शब्द वैसा ही है जैसे हिंदुओं में शूद्र होता हैं।भारतीय मुसलमानों में अक्सर निम्न जाति के लोगों को (बदजात) फला वाला कहकर संबोधित किया जाता है।यहां सैफी (बढ़ाई) ,( तेली) मलिक अंसारी (जुलाहा) विशेष रूप से अगड़ी जातियों द्वारा उपहास का पात्र रहे हैं।प्रिय पाठकों गौरतलब है कि इस्लाम के आखिरी पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब ने हुज्जातुल विदा के अपने अंतिम भाषण में कहा था कि किसी अरबी को अज्मी (अरब से बाहर के लोग) पर, और किसी अज्मी को अरबी पर कोई श्रेष्ठता नहीं है, न किसी गोरे को काले पर, और न किसी काले को गोरे पर, सिवाय तकवे (परहेजगारी) के। ’ इस बात के जरिए पैगंबर मोहम्मद साहब ने साफ तौर पर स्पष्ट संदेश दिया कि इस्लाम में इंसानों के बीच किसी तरह का नस्ली और जातिगत भेदभाव नहीं है। इंसान के अच्छे कर्म ही उसे श्रेष्ठ बनाते हैं ना कि वह जन्म के आधार पर श्रेष्ठ हो सकता है। मशहूर शायर अल्लामा इकबाल लिखते हैं कि एक ही सफ में खड़े हो गए महमूद-ओ-अयाज,ना कोई बंदा रहा ना कोई बंदा नवाज। अल्लामा इकबाल ने यह नज्म ’ बादशाह महमूद गजनवी और उनके गुलाम अयाज के एक ही लाइन में एक साथ नमाज पढ़ने पर लिखी थी। इकबाल ने इस शेर के जरिए यह बताने की कोशिश किया था कि इस्लाम धर्म के सभी मानने वाले बराबर हैं और उनमें किसी प्रकार की कोई ऊंच-नीच नहीं है। इस्लाम में कोई संदेह नहीं है कि नमाज के वक्त न कोई बादशाह होता है और न ही कोई गुलाम, सभी बराबर होते हैं, लेकिन ये नमाज के खत्म होते ही और मस्जिद के बाहर निकलते ही भारतीय मुसलमान भी बहुसंख्यक आबादी की तरह जातियों में बंटा हुआ नजर आता है। सवाल यह है कि जब इस्लाम में कोई जात-पात नहीं और सभी बराबर हैं तो भारतीय मुस्लिम समुदाय में जाति प्रथा कैसे आई? इस्लाम में जाति आधारित भेदभाव को मना किया गया। पैगंबर मोहम्मद साहब ने सभी मुसलमानों को एक बराबर माना तो फिर कैसे भारतीय मुस्लिम अलग-अलग जातियों में बंटा हुआ है।इस्लाम की शुरुआत हजरत आदम से हुई है और पैगंबर मोहम्मद साहब आखिरी नबी हैं।पैगंबर मोहम्मद साहब का जन्म मक्का शहर में हुआ, उस वक्त अलग-अलग कबीले हुआ करते थे। कुरैश कबीला, औस और खज़रज, बनू कुरैज़ा, बनू नदीर , और बनू कयनुक़ा,बनू गताफा, बनू किनाना, बनू खुज़ाआ, बनू हनीफा, बनू सक़ीफ, बनू तमीम कबीले थे, जनजाति हुआ करती थी। ये एक ही पूर्वज से संबंधित होते हैं, या जो एक ही क्षेत्र में रहते हैं और एक ही सामाजिक या सांस्कृतिक पहचान साझा करते हैं, अलग-अलग इलाके में अलग हुआ करते थे।हिंदू धर्म में जाति व्यवस्था के दो उल्लेख मिलते हैं, ऋग्वेद में कर्म के आधार पर यानि जो जिस तरह का काम करता था, उससे उसकी जाति निर्धारण होती थी ।धार्मिक पुस्तक मनुस्मृति में जन्म के आधार पर जाति के निर्धारण की बात कही गई है। मनुस्मृति के अनुसार हिंदुओं को चार वर्ण व्यवस्था में बांटा गया है, भगवान ब्राह्म के मस्तिष्क से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रीय, पेट से वैश्य और पैरों से दलित। भारत में इस्लाम आया तो तमाम हिंदू जातियों ने धर्मांतरण कर इस्लाम धर्म अपना लिया। उन्होंने अपना धर्म तो बदल लिया, लेकिन जाति नहीं बदली।इस तरह भारत में वैदिक काल में कर्म आधारित जाति व्यवस्था थी, जो कालांतर में जन्म आधारित हो गई, तो बिलकुल उसी पैटर्न पर मुसलमानों में भी जाति व्यवस्था मौजूद है। भारतीय उपमहाद्वीप यानी भारत, पाकिस्तान श्रीलंका नेपाल और बांग्लादेश के मुसलमानों के बीच जातियां मौजूद हैं, यह उन्हें जन्म के आधार पर श्रेष्ठ और पिछड़ा बनाती हैं।ऐसे में मुस्लिम जातियां को तीन वर्गों में रेखांकित किया जाता है। ‘अशराफ (उच्च जातियां)’,’अजलाफ (पिछड़ी जातियां)’, और ‘अरजाल’ (अतिपिछड़ी जातियां) कहा जाता है। ये जातियों के समूह हैं, जिसके अंदर अलग-अलग जातियां शामिल हैं। 1932 में मौलाना शफी उस्मानी ने भारतीय मुस्लिम जातियों का जिक्र किया और उन्होंने बताया कि कौन ऊंची जाति है और कौन पिछड़ी जाति का है , कैसे शेख, सैय्यद उच्च स्तरीय जातियां हैं और उस्मानी, अंसारी, कुरैशी, मंसूरी पिछड़ी जातियां हैं। देवबंदी विचार धारा के मौलाना अशरफ अली थानवी ने बाहिश्ती जेवर में लिखा है कि कैसे शेख, सैय्यद बराबर हैं।उन्होंने मुस्लिम ओबीसी जातियों को निम्न जाति के तौर पर उल्लेख किया है।शेख, सैय्यद, और मुगलों को मुस्लिम ओबीसी जातियों के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित करने को मना किया है।उन्होंने कहा कि शेख और सैय्यद बराबर हैं, उनकी आपस में शादी हो सकती है, लेकिन मुगल और पठान के साथ नहीं। प्रसिद्ध लेखक मसूद आलम फलाही ने भारत में जाति और मुसलमान किताब में मुसलमानों की जातियों का बहुत ही बराकी से वर्णन किया है। वो लिखते हैं कि मुसलमानों के बीच, विशेष रूप से काउ बेल्ट में, जाति संरचना कुल मिलाकर हिंदू जाति व्यवस्था की प्रतिकृति के समान है, जिसमें सभी तरह की कमियां हैं। यह इस्लाम धर्म के समानता के समतावादी और उच्च इस्लामी सिद्धांतों के बावजूद है। उन्होंने कहा कि कैसे अशराफ मुस्लिम उलेमाओं और बुद्धजीवी ने अपने आपको को सर्वश्रेष्ठ बताने के लिए इस्लाम के समानता के सिद्धांत को भी जातियों में बांट दिया है। मुसलमानों के बीच जाति व्यवस्था है और उसका पैटर्न उसी तरह का है, जैसे हिंदुओं में सवर्ण, पिछड़ा और दलित। हिंदुओं में जैसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण होते हैं, वैसे ही अशराफ़, अजलाफ़ और अरज़ाल को देखा जाता है। मुस्लिम समुदाय में भी दलित जातियां होती हैं, लेकिन उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिलता है।मुस्लिम समुदाय की जातियां 3 प्रमुख वर्गों और सैकड़ों बिरादरियों में विभाजित है।उच्चवर्गीय भारतीय, पाकिस्तानी, बांग्लादेशी, श्रीलंकाई नेपाली मुसलमानों को अशराफ कहा जाता है, जिसमें सैय्यद, शेख, मुगल, पठान, आते हैं। मुसलमानों के पिछड़े वर्ग की जातियों का अजलाफ कहा जाता है।जिसमें कुरैशी, मंसूरी, सलमानी, गुर्जर, गद्दी, घोसी, दर्जी, मनिहार, उस्मानी मलिक,अंसारी , सैफी, जैसी ओबीसी जातियां शामिल हैं। इसके बाद अतिपिछड़े मुस्लिम आते हैं, जिनको अरजाल कहा जाता है, जिसमें धोबी, मेहतर, अब्बासी, भटियारा, नट, हलालखोर, बक्खो, मोची, भाट, डफाली, पमरिया, नालबंद और मछुआरा शामिल हैं। मुसलमानों में कुछ लोगों को तो लगता है कि मुसलमानों में जाति के आधार पर कोई भेद ही नहीं है तो वहीं कुछ लोगों का मानना है कि मुसलमानों में भी जातिगत आधार पर भेद-भाव हैं । लेकिन उनमें उतने गंभीर मतभेद हैं नहीं, जितने कि हिंदुओं में है। इस्लाम धर्म के आधार पर मुस्लिम समुदाय के बीच में कोई भेदभाव नहीं होता है, लेकिन सामाजिक दृष्टिकोण से इनके बीच अंतर है।भारतीय – पाकिस्तानी- नेपाली – बांग्लादेशी सैय्यद खुद को सबसे श्रेष्ठ मानते हैं। और एक सैय्यद शादी अपने समुदाय में ही करेगा, किसी और मुस्लिम जाति में नहीं करेगा। मुसलमानों में भी जाति प्रथा पूरी तह से बहुसंख्यक आबादी की तरह ही काम करती है। विवाह और पेशे के अलावा मुसलमानों में अलग-अलग जातियों के रीति रिवाज भी अलग-अलग हैं। मुसलमानों में भी लोग अपनी ही जाति देखकर शादी ही नहीं करते बल्कि मुस्लिम इलाक़ों में भी जाति के आधार पर कॉलोनियां और मुहल्ले बने हुए दिखाई देते हैं। इसके अलावा उनके कब्रिस्तान, मस्जिदें भी कई जगह पर अलग-अलग हैं। आप देश के किसी भी प्रांत में जाकर देख सकते हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद, संभल, मेरठ, बागपत, गाजियाबाद, गौतमबुद्ध नगर, हापुड़, बुलंदशहर, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, शामली अलीगढ़, एटा, हाथरस, कासगंज, आगरा, मथुरा, फिरोजाबाद, मैनपुरी, बरेली, बदायूं, पीलीभीत, शाहजहांपुर में मुसलमान रहते हैं। उनके बीच अपनी जातियों की श्रेष्ठता को लेकर काफी तनाव रहता है। उनके अपने-अपने इलाके हैं। भारत एक जाति आधारित समाज है, जिससे हिंदू और मुस्लिम दोनों ही ग्रसित है।
— जुनैद मलिक अत्तारी
