कहानी

कहानी – शब्दों से परे

महानगर की भागदौड़ भरी जिंदगी में सुबह भी जैसे घड़ी की सुइयों के इशारे पर होती है। यहाँ लोग बस उठते हैं, दौड़ते हैं और पुरानी थकान को नई थकान में बदलने निकल पड़ते हैं। इसी रफ़्तार के बीच समीर और काव्या की अपनी-अपनी दुनिया भी चल रही थी। समीर बैंक में नौकरी करता था और काव्या एक एडवरटाइजिंग कंपनी में। एक कॉमन दोस्त की पार्टी में दोनों की पहली मुलाकात हुई। वह एक बेहद साधारण और औपचारिक सी मुलाकात थी। कुछ हल्की-फुल्की बातें हुईं, नंबरों का लेन-देन हुआ और फिर दोनों वापस अपने-अपने रास्तों पर आगे बढ़ गए।

समीर स्वभाव से एक शांत, विचारशील और आत्मीय इंसान था। उसे रिश्तों की कद्र थी और वह छोटी-छोटी चीजों में खुशियां तलाशने में यकीन रखता था। पार्टी के अगले दिन से ही समीर ने काव्या को सुबह का अभिवादन भेजना शुरू कर दिया। हर सुबह ठीक सात बजे काव्या के फोन की स्क्रीन पर समीर का एक छोटा सा लेकिन प्यारा सा संदेश चमक उठता था। कभी वह सिर्फ ‘गुड मॉर्निंग’ होता, तो कभी उसके साथ कोई सकारात्मक विचार या एक खूबसूरत फूल की तस्वीर होती। समीर का यह संदेश उसके दिन की एक स्वाभाविक शुरुआत बन गया था। उसे यह करना अच्छा लगता था। इसके पीछे कोई विशेष स्वार्थ या गहरी अपेक्षा नहीं थी, बस एक अच्छी शुरुआत साझा करने का एक मासूम सा प्रयास था।

दूसरी ओर, काव्या की जिंदगी बहुत अलग थी। विज्ञापन की दुनिया के दबाव, डेडलाइन्स और शहर की आपाधापी ने उसे बहुत व्यावहारिक और कुछ हद तक रूखा बना दिया था। जब उसे पहले दिन समीर का संदेश मिला, तो उसने उसे एक सामान्य औपचारिकता समझा। उसने एक छोटा सा स्माइली भेजकर जवाब दे दिया। अगले दिन फिर संदेश आया। काव्या ने फिर संक्षेप में जवाब दिया। लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते गए, यह एक नियमित सिलसिला बन गया। काव्या अक्सर सुबह उठते ही अपने ईमेल, क्लाइंट्स के मैसेज और दिनभर की मीटिंग्स के शेड्यूल में उलझ जाती थी। ऐसे में समीर का संदेश उसके लिए कभी-कभी ध्यान भंग करने वाला भी लगता था। कई बार वह संदेश देखती और उसे बिना कोई जवाब दिए स्वाइप कर देती। कभी वह पढ़ती लेकिन रिप्लाई करने का समय नहीं निकाल पाती। और जब कभी उसका मूड बहुत अच्छा होता या छुट्टी का दिन होता, तो वह एक संक्षिप्त सा ‘आपको भी’ या ‘धन्यवाद’ लिखकर भेज देती।

समीर काव्या की इस बेरुखी या व्यस्तता को समझता था। उसने कभी काव्या से यह शिकायत नहीं की कि वह उसके संदेशों का जवाब क्यों नहीं देती? समीर के लिए अपना काम करना महत्वपूर्ण था, प्रतिक्रिया की अपेक्षा करना नहीं। वह बस यही सोचकर खुश हो लेता था कि शायद सुबह उठकर उसका भेजा गया एक सकारात्मक शब्द काव्या के चेहरे पर एक पल के लिए ही सही, लेकिन मुस्कान जरूर लाता होगा। महीनों तक यह सिलसिला यूं ही चलता रहा। सर्दी, गर्मी, बरसात, मौसम बदलते रहे, लेकिन ठीक सात बजे काव्या के फोन पर आने वाले उस संदेश का समय कभी नहीं बदला।

फिर एक दिन समीर के मन में एक विचार आया। वह अपनी बालकनी में खड़ा सुबह की चाय पी रहा था। उसने फोन उठाया और काव्या का चैट बॉक्स खोला। उसने देखा कि पिछले कई दिनों से उसकी तरफ से भेजे गए संदेशों का काव्या ने कोई जवाब नहीं दिया था। समीर के स्वाभिमान और उसकी संवेदनशीलता ने अचानक एक सवाल खड़ा कर दिया। उसने खुद से पूछा कि क्या वह अनजाने में काव्या को परेशान तो नहीं कर रहा है। हो सकता है कि काव्या को यह रोज-रोज का संदेश भेजना एक अवांछित दखलंदाजी लगता हो? समीर ने सोचा कि किसी पर अपनी उपस्थिति इस तरह थोपना ठीक नहीं है। शायद काव्या को उसकी इस आदत से कोई फर्क भी नहीं पड़ता। अगर वह संदेश नहीं भेजेगा, तो काव्या के दिन पर कोई असर नहीं पड़ेगा, बल्कि शायद उसे एक नोटिफिकेशन कम मिलने से शांति ही मिलेगी। यही सोचकर समीर ने उस दिन संदेश टाइप किया, लेकिन उसे भेजा नहीं। उसने फोन स्क्रीन लॉक किया और अपनी दिनचर्या में लग गया। उसने फैसला किया कि अब वह काव्या को गुड मॉर्निंग का मैसेज नहीं करेगा।

उधर, काव्या की सुबह हर दिन की तरह शुरू हुई। अलार्म बजा, वह उठी, उसने अपनी कॉफी बनाई और हमेशा की तरह अपना फोन चेक किया। उसने मेल्स देखे, व्हाट्सएप पर आए ऑफिस के ग्रुप मैसेज देखे, लेकिन कहीं कुछ कमी सी लग रही थी। उसने ध्यान नहीं दिया और काम में लग गई। उस दिन ऑफिस में बहुत काम था, इसलिए दिन कैसे बीत गया, उसे पता ही नहीं चला।

अगले दिन सुबह फिर काव्या उठी। उसने फोन उठाया। स्क्रीन पर कई नोटिफिकेशन थे, लेकिन वह खास संदेश नहीं था जैसा हर सुबह सात बजे आता था। काव्या को थोड़ा अजीब सा लगा। उसने समीर का चैट खोला। आखिरी संदेश दो दिन पुराना था। काव्या ने सोचा कि शायद समीर बीमार होगा या किसी काम में बहुत व्यस्त होगा। उसने खुद कोई संदेश नहीं भेजा और अपने काम के लिए निकल गई।

तीन दिन बीत गए। चार दिन बीत गए। पूरा एक हफ्ता गुजर गया। समीर की तरफ से कोई संदेश नहीं आया। समीर ने खुद को बहुत सख्ती से रोक रखा था। कई बार सुबह उठकर उसकी उंगलियां अपने आप काव्या का नाम फोन में तलाशने लगती थीं, लेकिन वह खुद को यह याद दिलाकर रोक लेता था कि काव्या को उसकी कोई परवाह नहीं है।

लेकिन दूसरी तरफ काव्या के भीतर एक अजीब सी हलचल शुरू हो गई थी। हर सुबह जब वह अपना फोन उठाती, तो उसकी आंखें अनजाने में ही उस एक संदेश को तलाशने लग जाती थीं। वह संदेश जो कभी उसे एक अनावश्यक औपचारिकता लगता था, आज उसकी अनुपस्थिति उसे बेचैन कर रही थी। काव्या को महसूस होने लगा कि उसकी सुबह की शुरुआत अधूरी सी है। वह कॉफी पीते हुए अक्सर समीर के पुराने संदेशों को स्क्रॉल करके देखने लगी। उसने ध्यान दिया कि कैसे हर सुबह समीर ने बिना नागा किए उसे याद किया था। उसने महसूस किया कि कैसे समीर के उन छोटे-छोटे शब्दों में एक अनकही परवाह छिपी होती थी। काव्या को खुद पर गुस्सा आने लगा कि उसने कभी उस इंसान के प्रयासों की कद्र नहीं की, जिसने लगातार उसे एक सकारात्मक ऊर्जा देने की कोशिश की थी।

आठवें दिन की सुबह काव्या से रहा नहीं गया। उस सुबह शहर में हल्की बारिश हो रही थी। मौसम में एक अजीब सी उदासी और साथ ही एक सुकून भी था। काव्या ने अपनी बालकनी में खड़े होकर बारिश को देखा और फिर एक गहरी सांस लेकर अपना फोन उठाया। उसने समीर का चैट खोला और टाइप करना शुरू किया। उसकी उंगलियां थोड़ी कांप रही थीं। उसने बस इतना लिखा, आज गुड मॉर्निंग नहीं भेजा?

समीर उस समय अखबार पढ़ रहा था। फोन की स्क्रीन रोशन हुई। उसने काव्या का नाम देखा तो उसके चेहरे पर एक आश्चर्य भरी मुस्कान आ गई। उसे यकीन नहीं हुआ कि काव्या ने खुद उसे संदेश भेजा है। उसने संदेश पढ़ा और उसके मन का सारा संशय एक पल में धुल गया। समीर ने मुस्कुराते हुए तुरंत टाइप किया और जवाब भेजा, मैंने सोचा कि जब मैं संदेश नहीं भेजूंगा, तो आपको मेरी कमी महसूस ही नहीं होगी। मुझे लगा कि शायद मेरे संदेश आपको परेशान करते हैं?

काव्या उस जवाब को देखकर एक पल के लिए निशब्द रह गई। उसकी आंखों में हल्की सी नमी आ गई थी। उसने महसूस किया कि कैसे हम अक्सर उन चीजों और उन लोगों को बहुत हल्के में ले लेते हैं जो हमारे जीवन में बिना किसी शोर-शराबे के मौजूद रहते हैं। काव्या ने अपने दिल की बात को शब्दों में पिरोया और जवाब दिया, कुछ लोगों की आदत इतनी प्यारी होती है कि उनके बिना पूरा दिन अधूरा सा लगता है। मुझे पहले कभी एहसास नहीं हुआ, लेकिन पिछले एक हफ्ते से मेरी सुबह सुबह जैसी नहीं लग रही थी। आपकी उस छोटी सी आदत ने मेरी जिंदगी में एक बहुत खूबसूरत जगह बना ली थी, जिसका मुझे खुद भी अंदाजा नहीं था।

समीर यह पढ़कर बहुत भावुक हो गया। उसने कभी नहीं सोचा था कि उसका वह छोटा सा प्रयास काव्या के दिल में इतनी जगह बना लेगा। उसने काव्या को जवाब दिया, मुझे यह जानकर बहुत खुशी हुई काव्या। कभी-कभी हमें लगता है कि हमारे छोटे कदमों का कोई मोल नहीं, लेकिन आज आपने मुझे अहसास दिलाया कि खामोश प्रयासों की भी गूंज होती है।

उस सुबह दोनों ने अपने-अपने घरों की बालकनी में खड़े होकर बारिश को देखा। भले ही वे मीलों दूर थे, लेकिन उस दिन उनके बीच की सारी दूरियां खत्म हो गई थीं। उस एक पल ने उनको यह समझा दिया था कि रिश्ते सिर्फ बड़े-बड़े वादों, लंबी मुलाकातों या बहुत सारे शब्दों से नहीं बनते। रिश्ते तो उन छोटे-छोटे एहसासों, उस निरंतर परवाह और उन अनकही आदतों से बनते हैं जो धीरे-धीरे हमारी रूह का हिस्सा बन जाते हैं। उस दिन के बाद से उनकी सुबह कभी अधूरी नहीं रही।

— महेन्द्र तिवारी

महेन्द्र तिवारी

जन्म : फरवरी 1971, भोजपुर (बिहार) शिक्षा : स्नातकोत्तर (अर्थशास्त्र), डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा सेवाएं : भूतपूर्व वायुसैनिक एवं वर्तमान में राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली में कार्यरत कृतियाँ : विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं में अब तक सैकड़ों लेख, कविताएँ और कहानियाँ प्रकाशित। संपादन : ‘दि ग्राम टुडे’ लघुकथा विशेषांक (अतिथि संपादक) प्रकाशन : कहानी संग्रह - एक लेखक का पुनर्जन्म (शीघ्र प्रकाश्य) मोबाइल : (+91) 9989703240 ई-मेल : mahendratone@gmail.com