गीत/नवगीत

गीत

​साँस के सूत से बुन रही ज़िंदगी
एक चूनर नई धूप की ओढ़कर
चल रही आत्मा पार के लोक को
धूल के ये पुराने नगर छोड़कर

​देह का दीप माटी की ओट में
जल रहा है मगर जल न पाया कभी
स्वप्न की जो सजी थी यहाँ महफ़िलें
एक भी बिंब सच हो न पाया कभी
मौन के पंख पर उड़ चला मन विहग
सारे बंधन धरा के यहाँ तोड़कर
साँस के सूत से बुन रही ज़िंदगी

​धूप की उँगलियाँ छू रही हैं हृदय
जैसे वीणा के तारों पर हो कंपन
दृष्टि ‌में ‌बस‌ गया ‌‌वो ‌ जो ‌दिखता नहीं
हो रहा है निराकार से अब मिलन
छू लिया है क्षितिज को मरुस्थल ने भी
अपनी ‌प्यासों का गहरा सफ़र मोड़कर
साँस के सूत से बुन रही ज़िंदगी

​शब्द की देह अब अर्थ में ढल गई
जैसे सरिता मचल कर मिले सिंधु में
है समाया हुआ विश्व का विस्तार भी
एक अंतर्मन के सरल बिंदु में
हो गई रंज की पीर अब आरती
स्वयं को चेतना के शिखर जोड़कर
साँस‌ के ‌सूत से बुन रही ‌‌ ज़िंदगी

— भानु शर्मा रंज

भानु शर्मा रंज

कवि और गीतकार धौलपुर राजस्थान M-7976900735, 7374060400

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