निश्चल संवेदना
बदलते वक्त के साथ
बहुत कुछ बदलता देखा
मित्र को शत्रु बनते
शत्रु को मित्र बनते देखा।
जानता भी नहीं था जिनको
उनको अपना बनते देखा
और जानता था जिनको
उनको पराया होते देखा।
भागता रहा हमेशा ही
अपनों की तलाश में
खोजता रहा भावनाओं के द्वार
हर किसी के हृदय में।
अन्वेषण करता रहा
विचारों को समझने वालों की
खोजता रहा मन के मीतों को
जो समझ जाए मेरे हृदय की
हर निश्चल संवेदनाओं को।
— डॉ. राजीव डोगरा
