खून से लाल हुई वर्दी
वहाँ पे खून से लाल हुई जो वर्दी,
वह केवल मात्र ‘कपड़ा’ नहीं थी।
उसमें एक घर की भी उम्मीद थी,
माई की दुआँ, बच्चों की हँसी थी।
उस सड़क पर जब ‘पत्थर’ बरसे,
यूं घायल हुए उनके कई अरमान।
वे तो कर्तव्य निभाने ही निकले थे,
कैसे बन गए वे हिंसा की पहचान।
वर्तमान लोकतंत्र का अर्थ यही है,
आज संवादों से ही ‘राह’ निकले।
यदि क्रोध की ज्वाला जब भड़के,
तब रिश्तों के ‘दीपक’ ना ही बुझें।
न कोई छात्र दोषी कहलाएँ सब,
सम्मान रहें न हर वर्दी कठोर बने।
निर्मल सत्य वही है जो न्याय करे,
उससे मानवता और मजबूत बने।
आओ ऐसा देश हिंदुस्तान बनाएँ,
जहाँ मतभेदों का भी सम्मान हों।
ना खून से कभी लाल हों वर्दियाँ,
ना आँसूओं से वीरान मकान हों।
— संजय एम तराणेकर
