मुक्तक/दोहा

मौलिक दोहे

मन के सच्चे मित्र जो, छाया बनकर साथ।
धूप पड़े संसार की, थामे जीवन-हाथ॥

दौलत, शोहरत, नाम सब, पल में जाएँ खोय।
सच्ची यारी एक ही, जीवन भर की होय॥

आँसू जिनसे बाँटते, वही सखा अनमोल।
हँसी तो जग बाँट ले, दुख का कौन हमजो़ल॥

रिश्ते कागज़ हो गए, मतलब की है रीत।
मित्र वही जो दर्द में, लिख दे मन की प्रीत॥

वक्त नदी-सा बह गया, बदले लाखों रंग।
सच्चा यार न बदले, चाहे टूटे अंग॥

अहंकार की आग में, जलते देखे गाँव।
प्रेम बचाए हर धरा, मित्र बने जब छाँव॥

मीठे बोलों से बड़ा, जग में नहीं प्रसाद।
कटु वचन पल में करें, वर्षों का बरबाद॥

जीवन इक पुस्तक बड़ी, हर दिन नया अध्याय।
प्रेम, दया, विश्वास से, सुंदर हो हर पाय॥

यादों की इस भीड़ में, कुछ चेहरे भगवान।
जिनसे जीना सीखकर, पाया अपना मान॥

नाम न पत्थर पर लिखो, लिख दो सबके प्राण।
मरकर भी जो याद हो, वही सच्चा इंसान॥

— धर्मेन्द्र शर्मा

धर्मेन्द्र शर्मा

धर्मेन्द्र शर्मा - परिचय जन्म स्थान: ग्राम रानपुर (अंबाह, मुरैना, मध्य प्रदेश) माता-पिता: श्रीमती सोमवती जी और श्री कृष्ण शर्मा शिक्षा: बी.एससी. नर्सिंग, एम.एससी. (रसायन विज्ञान), डी.सी.ए. और वर्तमान में एम.एससी. (जूलॉजी) में अध्ययनरत। प्रमुख रचनाएँ: काव्य-संग्रह: ‘ख़ामोशी के अल्फ़ाज़’ उपन्यास एवं कहानियाँ: ‘भाई फिर बटवारा क्यों?’, ‘वैश्या ही चरित्रहीन क्यों?’, ‘भाई मुझे तुम पर भरोसा है’, ‘4 साल 230 दिन’, और ‘अधूरी मोहब्बत की दास्तान’। विशेषता: ग्रामीण परिवेश, मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक सरोकारों की सशक्त अभिव्यक्ति। M= 90391 04716