बड़ा बेटा
घर का पहला दीप है, पहली उसकी राह।
अपने आँसू पी गया, बाँटी सबकी चाह॥
माँ की आँखें बोलतीं, बेटा देगा साथ।
पिता भरोसे चल पड़े, थाम उसी का हाथ॥
कंधों पर परिवार का, लेकर सारा भार।
हँसकर हर तूफ़ान से, करता रहा पुकार॥
मन भी उसका रो पड़ा, मगर न निकली आह।
घर का पहला दीप है, पहली उसकी राह॥
चेहरे पर मुस्कान थी, भीतर गहरा शोक।
सबको देता हौसला, सहता अपने रोक॥
आँसू पीकर बाँटता, सबको नई बहार।
मन में रखकर पीर भी, करता सबसे प्यार॥
थककर भी वह बोलता, “सब हो जाए, वाह!”
घर का पहला दीप है, पहली उसकी राह॥
माँ की हर उम्मीद का, बनता रहा आधार।
पिता के विश्वास का, वही रहा संसार॥
अपने सपनों से बड़ा, उसे लगा परिवार।
त्याग, समर्पण, प्रेम से, लिखता नया विचार॥
जिसने सबका भार लिया, किसको उसकी चाह—
घर का पहला दीप है, पहली उसकी राह॥
पूछे जग संसार से, कैसा यह व्यवहार।
हाल सभी का पूछते, उसका कौन सहार॥
भाई-बहनों के लिए, छोड़ दिए अरमान।
ईश्वर उसके त्याग का, रखे सदा सम्मान॥
बड़ा पुत्र मुस्का दिया, कर इच्छा का दाह—
घर का पहला दीप है, पहली उसकी राह॥
— डॉ. सत्यवान सौरभ
