कहानी – अनबूझा प्रश्न
‘ स्व’ और ‘ सवि’
‘सवि’ और ‘ स्व’- दो नाम मेरे लिए परिचित हैं। इनकी कहानी को कितनी ही बार कागज़ों पर उतारना चाहा, हर बार कुछ पृष्ठ काले करके अधूरी ही छोड़ दी। ‘ स्व’ के आंसुओं में भीगी और ‘ सवि’ की मधुर खिलखिलाहट में डूबी इस व्यथा कथा को आज लिखने की कोशिश कर रहा हूं।
मेरे सामने अभी भी दोनों के पत्र खुले पड़े हैं। हवा के एक झौंके ने उन्हें सर्र से उड़ा दिया। ‘ सवि’ का पत्र छिटक कर दूर जा गिरा। ‘ स्व’ का पत्र अभी भी वहीं पड़ा है —
मुस्करा दिया मैं – स्व और सवि और विधि का व्यंग्य। बहुत चाहा दोनों को मिलाना- लेकिन दोनों चली गई स्नेह की छाया और आंखों में शिकायत लिए।
बचपन में मैंने फूल के दो पौधे लगाए थे। दोनों पास ही खड़ी थी। मैंने सरल भाव से पौधों को इंगित करते हुए कहा था- यह स्व और वह सवि। हंस दी थी दोनों।
वसंत आया, फूल के दोनों पौधे बढ़ते गए और फिर पतझड़ के क्रूर शिकंजे ने अपना जौहर दिखा दिया। सवि के पौधे पर कलियां खिलीं पर स्व के पौधे पर कभी बहार न आई और न ही फूल खिले। मुझे चोट पहुंचती। मैं विचलित हो उठता और खाली समय में दोनों पौधों को सींचता, सहलाता पर स्व के उदास पौधे को जिला नहीं सका।
दिन गुजरते गए —
दोनों के स्वभाव में काफी अंतर था। एक शांत और गंभीर ,दूसरी चंचल पर मुझे दोनों प्रिय थीं।’ स्व’ मेरे खामोश जीवन का सहारा थी, मेरी गंभीर प्रवृत्ति और मेरे लेखन की प्रेरणा। ‘सवि’ मेरे जीवन का लावण्य, मेरी मुस्कराहट। दोनों को मुझसे प्रेम था पर उनके स्नेह में भी अंतर था। ‘स्व’ के स्नेह में शीतलता और ‘ सवि’ तो थी ही उष्णता।
मैं अनजाने में ही शायद ‘ स्व’ की ओर अधिक ध्यान दिया करता। मुझे मालूम था कि उसे सहारा चाहिए, किसी के स्नेह का आवरण चाहिए। नहीं तो वह मिट जायेगी। और फिर वह इस बात से भी अनभिज्ञ नहीं थी कि मैं उसका भाई नहीं हूं। यही कारण था कि शायद अनजाने में ही मौसी की उस अनाथ लड़की के प्रति मुझे अपार स्नेह हो गया था। ‘ सवि’ अपनी मृगनयनी आंखों में आंसू भर कर कहती- ” भैया। तुम स्व को मुझसे अधिक चाहते हो।” मैं डांट देता। और सवि रोती हुई मां के पास चली जाती। मां के डांटने से पहले ही हम दोनों रफूचक्कर हो जाते थे।
दिन— माह– वर्ष आए और चले गए।
‘ स्व’ को कला से प्रेम था और ‘ सवि ‘ को संगीत से। ‘ सवि ‘ ने संगीत में एम ए किया और ‘ स्व’ ने आर्ट में पंचवर्षीय कोर्स। मैंने एम बी बी एस किया और डाक्टर बन गया। ‘स्व’ की प्रेरणा का ही परिणाम था यह। हमेशा कहा करती थी” आप डाक्टर बनो। कितनी प्रसन्नता होगी मुझे जिस दिन सैकड़ों पीड़ितों के प्राण बचा सकोगे। मैं तब गर्व से कहूंगी – ये मेरे भैया हैं।” मैं हंस देता। स्नेह से उसके बालों को थपकी देकर कहता- जा सो जा। या रातभर भैया के सिरहाने बैठी रहेगी।”
” ऐसा मेरा सौभाग्य कहां!” ‘स्व’ मुस्कुराने का असफल प्रयास करती। उस मुसकुराहट में विषाद की रेखा होती। इसके कारण से मैं अनभिज्ञ नहीं था। बचपन में ही ‘ स्व’ के माता पिता की कार दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी और मां अपनी बहन की उस बच्ची को अपने पास ले आई थी। परन्तु ‘ स्व’ जैसे जैसे बड़ी होती गई मां उससे खिंचती चली गई।’ सवि’ का बचपना करना सभी को अखरता। मासूम ‘ स्व’ पर उसका गुस्सा उतरता। मैं कुछ भी करने का साहस नहीं जुटा पाता। मां के व्यंग बाण और सवि की खिलखिलाहट उसे वेदना पहुंचाते। जब कभी भी अत्यंत दुखी हो जाती तो मेरे कमरे में आकर रोने लगती। मैं उसे सांत्वना देता।
” मेरी नन्हीं दीदी रोती क्यों है?” वह रोती रहती। फिर सिसकियां धीरे धीरे कम होने लगती।
‘ स्व’ मां के साथ घर का सारा काम काज करवाती पर इसका श्रेय उसे कभी नहीं मिलता। एक दिन उसे बुखार था। काम नहीं कर पाई तो मां ने आंगन में खड़े हो कर कहा था-” तो क्या मेरी फूल सी ‘ सवि’ काम करें!”
” मां।” मैं चीख उठा था।” यह कैसा अन्याय है। कुछ तो सोचो। वो भी तुम्हारी बेटी की तरह है।”
” बेटी तो नहीं है न!” मां ने और ऊंचे स्वर में कहा था।
कुछ वर्ष और—-
‘ स्व’ ने 21 वां और ‘सवि’ ने 20 वां वर्ष पूरा किया। मां को ‘ सवि’ के विवाह की चिंता हुई तब धीरे से मैंने कहा था” मां। स्व बड़ी है। पहले उसकी शादी तो होने दो।”
मां नाराज़ हो गई थी ” सारा दिन ‘ स्व’– ‘स्व’ ! जाने क्या जादू कर दिया है इस लड़की ने? ” पर जब मां शांत हुई उन्होंने मुझे बुलाकर कहा-
” शरद। श्रीमती केशव का पत्र आया है। लिखा है कि उसका भाई रमन इंजीनियरिंग करके लौटा है। अपनी ‘ सवि’ को देखने आ रहे हैं”
मैंने सब सुना समझा। रह रहकर’ स्व’ की आंखों में तैरता एक अनबूझा प्रश्नचिह्न मुझे व्यथित करने लगता- भैया मेरा अपराध क्या है!!
कुछ दिन बाद मां के कहने पर मै श्रीमती केशव और रमन को लेने स्टेशन गया था। लौटने पर जब काल बैल के बजने पर ‘ स्व’ को द्वार पर खड़े पाया तो चौंक गया। मां की सख्त हिदायत के बावजूद ‘ स्व’ यहां कैसे! फिर ख्याल आया कि हम समय से पहले आ गये थे।
मै
मैं रमन की ओर मुड़ा। सुन्दर चेहरे पर प्रशंसनीय भाव थे। ‘ स्व’ को जब वस्तुस्थिति का भान हुआ तो संकोच से आंखें नीची कर के भाग गई।
मिसेज केशव ने पूछा ” यही!”
” जी हां ।यही मेरी बहन है –” बहुत बड़े सत्य को झुठला दिया था मैंने। तभी मां का तमतमाया चेहरा मेरे ज़हन में उभरा। मां को जब सत्य का पता चला तो मेरे सामने ही हाथ से कांच की प्लेट ज़मीन पर दे मारी। कांच का एक टुकड़ा छिटक कर मेरे माथे पर आ लगा। घाव तो समय रहते भर गया पर निशान आज भी मौजूद है।
‘ सवि’ को देखकर भी रमन ने ‘ स्व’ को पसंद किया। मां ‘स्व’ और रमन की शादी में सम्मिलित नहीं हुई। ‘ स्व’ की विदाई के समय रमन के कंधे पर हाथ रखकर मैंने कहा था -“रमन बाबू! ‘स्व’ मेरी बहन से बढ़कर है, उसे –“
रमन मुस्करा दिया ” आपके स्नेह की थाह उसी दिन देख ली थी जब द्वार पर खड़ी ‘ स्व’ को आपने अपनी बहन कहा था।”
कुछ माह पश्चात ‘ सवि’ भी चली गई। मां बहुत चाहने पर भी मुझसे नाराज़ नहीं रह पाई।
आज सोचता हूं मैंने वही किया जो मेरा कर्तव्य था। ‘ सवि’ ने आज भी पत्र में वही उलाहना दिया है -” भैया। मेरी परवाह क्यों करने लगे आप! ‘ स्व’ जो है”
‘ स्व’ और ‘ सवि ‘ के रास्ते अलग-अलग हैं, लेकिन एक भाई की अपनी बहन के लिए तमन्ना यही होती है कि वह खुश रहे। लेकिन आज भी वह प्रश्न अनबूझा ही है कि दोनों में मुझे कौन अधिक प्रिय है।’ स्व’ के बिना’सवि’ की हंसी हंसी नहीं लगती और ‘ सवि’ के बिना ‘ स्व’ की सिसकियों में दुख का आभास नहीं होता।
— अशोक जैन
