मुक्तक/दोहा

चार लाइनें

हम तो पत्थर हैं बस नींव में जड़े जायेंगे।
ठुकराइये मत हम सभी के काम आयेंगे।
माना कि निर्जीव हैं अपनी ख़बर रखते हैं –
हम महलों में सजकर उन्हें सजीव बनायेंगे।।

— अशोक जैन

अशोक जैन

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