कैद करती रेखाऍं
हमें कैद करती हैं उनकी बनाई रेखाऍं
रेखाऍं कुछ सीधी होती है तो कुछ टेढ़ी
साजिश की टेढ़ी रेखाएं पहचान में नहीं आती
हमारी अभिव्यक्ति को घेर लेती है वह
छिन लेती है वह हमसे हमारी जमीन
तब हम जमीन पर होते कहाॅं हैं?
उसकी अमानवीय प्रवृत्ति हमें ले लेती है अपने घेरे में
उसकी टेढ़ी-मेढ़ी सर्पाकार रस्सी हिलने नहीं देती हमें
तो चैन से कहाॅं रहने देगी वह
हम हैं कि उसके अधीन कैद होते हैं
बोल नहीं पाते/किसी कठिनाई में मुॅंह खोल नहीं पाते
मछलियाॅं जैसे चलती है पानी में
पर घिर जाती है जाल में और,,,,
और उसे पता तक नहीं होता
बिल्कुल वही स्थिति हमारी होती है
हम भीतर और बाहर से घिरे हुए होते हैं
सुलगा नहीं पाते अपना चूल्हा
सुलगाते भी हैं तो बज जाती है काम की सीटी
हमें कैद कर रखी है शक्ति की सशक्त रेखाऍं
गाॅंव से शहर गया युवक ले नहीं पाता राहत की सांस।
— विद्या शंकर विद्यार्थी
