परिश्रम का मूल्यांकन
“धूप में खटते जान जाती है तुम्हारी और पैसे तुम्हें पूरे चाहिए, कामचोर पैसे डाल में लगते हैं? ” मुंशी ने सोमरा पर अपनी जुबान चलायी। सोमरा से रहा नहीं गया क्योंकि वह तो हमेशा हक भर मेहनत करता है, चाहे कड़ी से कड़ी धूप क्यों न हो।आज रात में उसे पतला दस्त हुआ जिससे उसे कमजोरी हो गई, फिर भी वह अपने काम पर लग गया, आकर। आदमी के साथ आदमी ऐसा व्यवहार करेगा उसे ऐसा भरोसा नहीं था, बात की चोट वह सह नहीं सका।
” खबरदार मुंशी, जो आपकी अब जुबान चली तो,,, कह देता हूॅं,,,, हम भी आदमी हैं, कोई मशीन नहीं,,,, रात में तबीयत खराब हो गई थी, हमारी। जहाॅं कामचोर कहा आपने तो मिट मरेंगे, हम।” सोमरा की बात हवा में फैल गई, एक साथ काम करने वाले शीघ्र आ गये।
“चलो रे सभी काम छोड़कर यहाॅं से अपने घर चलो।” यह सदियों से दबाए जा रहे सोमरा का स्वर था, प्रतिरोध का स्वर भी कि मजदूरों पर चाबुक चलाने के दिन गये। आदमी को सहानुभूति चाहिए चाबुक नहींं। कब होगा परिश्रम का मूल्यांकन ?
— विद्या शंकर विद्यार्थी
