लहू से लिखी आजादी की दास्तां
आए थे अंग्रेज़ करने राज हम पर,
समझते रहे हमको गुलाम ,
पकड़ ली क्रांतिवीरों ने जब अपने हाथ में लगाम,
लहू से लिखी हमने फिर अपनी आज़ादी की दास्तां।
कई बार लाठी खाई, खाई गोली भी बार बार,
अंग्रेजों तुम पीछे हटो,
करते रहे आंदोलन बारम्बार।
भगत सिंह था ये बोला, “डर क्या चीज है, फाँसी तोहफा है”
बिस्मिल ने था ये गाया, “सरफरोशी की तमन्ना अब दिल में है” ।
रानी लक्ष्मी बाई आई थी होकर घोड़े पर सवार,
अंग्रेजों की छाती पर तलवारों से किए थे उसने वार।
अंग्रेज़ों की नींद थी उड़ गई, जब उस वीर नारी ने रण था सारा भेदा कई बार।
गांधी जी ने था अपनाया “अहिंसा”, पर जिगरा फौलाद का,
बोस सुभाष चंद्र बोले थे लड़ के लेंगे खून का बदला,
बन के वीर सिपाही हिंदुस्तान का।
जब जलियाँवाला में गोलियाँ चलीं थी,
निहत्थों के खून से धरती भी लाल हुई थी,
उसी लाल से हमारे तिरंगे की इज्ज़त मालामाल हुई थी।
जिस माँ ने बेटा खोया,
उसने था रखा माथा ऊँचा अपना,
बहन ने थी राखी भेजी, “भैया लाज बचाना साथ में प्यारा तिरंगा रखना” ।
15 अगस्त था जब आया, आज़ादी का डंका था सबने बजाया,
मुफ्त में किसी को कुछ नहीं मिलता,
इतिहास गवाह है ,थी लिखी हमने लहू से आजादी की दास्तां।
— कैप्टन डॉ. जय महलवाल अनजान
