वे किसान
किसानों की बस्ती है
ईमानदारी का
मेहनत का
किसी का हिस्सा नहीं खाते हैं
मेहनत करके
उगाते फसल हैं
लहलहाती फसलों को देखकर
खुश होते हैं वे किसान
जब खेतों में जाते हैं
सिर्फ अपनी भूख
नही नजर आती है
बल्कि उन शहरों में
जो रहते हैं लोग
उनकी भूख मिटाने के लिए
अपना तन जलाते हैं
अपनी उम्मीद बेचकर
वे किसान
किसी की उम्मीद बनाते हैं
अपनी टूटी तकदीर से
दुनिया का पेट भरते हैं
वे सच्चे किसान
टूटी बस्ती में रहते हैं
— जयचन्द प्रजापति ‘जय’
