संसदीय गतिरोध: लोकतंत्र के लिए गंभीर चिंता
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी संसद है। संसद केवल कानून बनाने की संस्था नहीं है, बल्कि वह देश की जनता की आकांक्षाओं, समस्याओं और प्रश्नों को राष्ट्रीय विमर्श का मंच प्रदान करती है। जनता अपने प्रतिनिधियों को इसलिए चुनकर भेजती है कि वे देश के सामने उपस्थित समस्याओं पर चर्चा करें, सरकार से प्रश्न पूछें, नीतियों की समीक्षा करें और आवश्यक कानूनों के निर्माण में अपनी भूमिका निभाएं। ऐसे में जब संसद की कार्यवाही बार बार हंगामे, नारेबाजी और विरोध प्रदर्शन के कारण बाधित होती है, तब उसका नुकसान किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं रहता। इसका सीधा असर लोकतांत्रिक व्यवस्था और देश की जनता पर पड़ता है।
हाल में समाप्त हुए संसद के मानसून सत्र ने इस चिंता को फिर गहरा कर दिया है। 20 जुलाई से 13 अगस्त 2026 तक चले इस सत्र में दोनों सदनों में कई अवसरों पर भारी हंगामा हुआ और कार्यवाही बाधित रही। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार लोकसभा की उत्पादकता केवल 19 प्रतिशत और राज्यसभा की 39 प्रतिशत रही। यह आंकड़ा केवल संसद के कम काम करने की कहानी नहीं कहता, बल्कि यह भी बताता है कि लोकतांत्रिक संवाद के लिए उपलब्ध बहुमूल्य समय का कितना बड़ा हिस्सा राजनीतिक टकराव की भेंट चढ़ गया।
इस स्थिति के लिए विपक्ष को पूरी तरह जिम्मेदार ठहराना राजनीतिक दृष्टि से सुविधाजनक हो सकता है, लेकिन संसदीय लोकतंत्र की दृष्टि से तस्वीर कुछ अधिक व्यापक है। विपक्ष का काम सरकार से सवाल पूछना, उसकी नीतियों की आलोचना करना और जनता से जुड़े गंभीर विषयों को सदन में उठाना है। सरकार का दायित्व भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि वह विपक्ष की बात सुने, उचित प्रश्नों का उत्तर दे और सदन में सार्थक चर्चा का वातावरण बनाए। फिर भी जब विपक्ष अपनी बात रखने के लिए सदन को लगातार बाधित करने का रास्ता अपनाता है, तब उसके विरोध का उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाता है।
लोकतंत्र में विरोध का अधिकार अत्यंत महत्वपूर्ण है। सरकार के सामने खड़े होकर असहमति व्यक्त करना लोकतांत्रिक व्यवस्था की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी जीवंतता का प्रमाण है। परंतु असहमति और अवरोध में अंतर है। यदि कोई दल किसी मुद्दे पर सरकार को घेरना चाहता है तो उसके पास अनेक संसदीय माध्यम उपलब्ध हैं। प्रश्न पूछे जा सकते हैं, चर्चा की मांग की जा सकती है, प्रस्ताव लाए जा सकते हैं, समितियों के माध्यम से विषय की पड़ताल कराई जा सकती है और मतदान के समय सरकार की नीति का विरोध किया जा सकता है। इन उपायों का प्रभाव तब अधिक होता है जब विपक्ष अपनी बात तर्क और तथ्यों के साथ जनता तथा सदन के सामने रखता है।
संसद को लगातार बाधित करने से सबसे पहले प्रश्नकाल प्रभावित होता है। प्रश्नकाल वह अवसर है जब सांसद अपने क्षेत्र और देश से जुड़े प्रश्न सरकार के सामने रखते हैं। अनेक प्रश्न सामान्य नागरिकों की समस्याओं से जुड़े होते हैं। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, महंगाई, परिवहन, सुरक्षा, सामाजिक कल्याण और प्रशासन से संबंधित सवालों के उत्तर सरकार को देने होते हैं। यदि सदन में हंगामे के कारण प्रश्नकाल ही ठीक से नहीं चल पाता तो उन लाखों नागरिकों की आवाज भी कमजोर पड़ जाती है, जिन्होंने अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से अपनी समस्या संसद तक पहुंचाई है।
संसद में विधेयकों पर चर्चा का महत्व भी कम नहीं है। किसी कानून का प्रभाव वर्षों और कई बार पीढ़ियों तक पड़ सकता है। इसलिए उसके प्रत्येक प्रावधान पर गंभीर चर्चा आवश्यक होती है। सत्ता पक्ष के पास बहुमत हो सकता है, लेकिन बहुमत का अर्थ यह नहीं कि कानून बनाने की प्रक्रिया में विचार विमर्श की आवश्यकता समाप्त हो गई। विपक्ष की आपत्तियां कई बार विधेयक की कमियों को सामने ला सकती हैं। विशेषज्ञों की राय, संसदीय समितियों की जांच और विभिन्न दलों के सुझाव कानून को अधिक प्रभावी बना सकते हैं।
दूसरी ओर यह प्रश्न भी उठता है कि यदि विपक्ष सदन में अपनी बात रखने का अवसर चाहता है तो उसे सदन को चलने देने की जिम्मेदारी भी स्वीकार करनी चाहिए। हाल के मानसून सत्र में सरकार की ओर से विपक्ष पर चर्चा से बचने और लगातार व्यवधान पैदा करने के आरोप लगाए गए। संसदीय कार्य मंत्री ने सत्र के बाद लोकसभा की 19 प्रतिशत और राज्यसभा की 39 प्रतिशत उत्पादकता का उल्लेख करते हुए विपक्ष को इसके लिए जिम्मेदार बताया। विपक्ष की ओर से भी सरकार पर महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा से बचने और आवश्यक प्रश्नों को पर्याप्त अवसर न देने के आरोप लगाए गए हैं। इससे स्पष्ट है कि गतिरोध के पीछे राजनीतिक अविश्वास की गहरी स्थिति मौजूद है।
लेकिन आरोप प्रत्यारोप से समस्या का समाधान नहीं होगा। संसद किसी राजनीतिक दल की निजी संपत्ति नहीं है। वह करोड़ों भारतीय नागरिकों की प्रतिनिधि संस्था है। जब संसद का एक दिन हंगामे की भेंट चढ़ता है तो केवल कुछ घंटे नहीं खोते, बल्कि कानून निर्माण, जनहित के प्रश्नों और राष्ट्रीय नीतियों पर विचार का अवसर भी खो जाता है। संसद की कार्यवाही चलाने में सार्वजनिक धन खर्च होता है। इसलिए सदन का समय नष्ट होना आर्थिक दृष्टि से भी चिंता का विषय है। हाल की रिपोर्टों में संसद के कामकाज में लगातार व्यवधान के कारण होने वाली आर्थिक और संस्थागत क्षति पर भी प्रश्न उठाए गए हैं।
सबसे गंभीर नुकसान लोकतांत्रिक संस्कृति का होता है। जब जनता बार बार अपने प्रतिनिधियों को सदन में नारे लगाते, आसन के सामने खड़े होते और कार्यवाही रुकवाते देखती है तो उसके मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर उसके प्रतिनिधि वहां किस उद्देश्य से भेजे गए हैं। लोकतंत्र केवल चुनाव कराने का नाम नहीं है। चुनाव के बाद निर्वाचित प्रतिनिधियों का नियमित, जिम्मेदार और प्रभावी काम करना भी लोकतंत्र का अनिवार्य हिस्सा है।
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि संसद में तीखी बहस लोकतंत्र के लिए नुकसानदेह नहीं है। मतभेद होना स्वाभाविक है। अलग अलग राजनीतिक दलों की विचारधाराएं और प्राथमिकताएं अलग हो सकती हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखा संवाद भी संसदीय जीवन का हिस्सा है। समस्या तब पैदा होती है जब संवाद की जगह शोर ले लेता है और तर्क की जगह नारे। लोकतंत्र में आवाज ऊंची करने से अधिक महत्वपूर्ण अपनी बात प्रभावी ढंग से रखना है।
विपक्ष को यह समझना होगा कि जनता केवल सरकार से जवाब नहीं मांगती, वह विपक्ष से भी जिम्मेदारी की अपेक्षा करती है। यदि किसी मुद्दे को लेकर जनता में असंतोष है तो विपक्ष के पास उसे संसद में तथ्यपूर्ण बहस का विषय बनाने का अवसर होता है। लगातार सदन बाधित करने के बजाय विपक्ष यदि किसी विषय पर व्यापक चर्चा कराए, सरकार को कठघरे में खड़ा करे और उसके उत्तरों को जनता के सामने रखे तो उसका राजनीतिक प्रभाव कहीं अधिक हो सकता है। सड़क पर विरोध और संसद में बहस दोनों लोकतांत्रिक अधिकार हैं, लेकिन संसद को ठप करना लोकतांत्रिक प्रभावशीलता का विकल्प नहीं हो सकता।
सरकार को भी आत्ममंथन करना चाहिए। बहुमत के आधार पर विधेयक पारित करना संसदीय प्रक्रिया का एक हिस्सा है, लेकिन लोकतंत्र की आत्मा केवल संख्या में नहीं, विचार विमर्श में भी निहित है। विपक्ष की उचित मांगों को सुनना, महत्वपूर्ण विषयों पर पर्याप्त चर्चा के लिए समय देना और संसदीय समितियों को मजबूत बनाना सरकार की जिम्मेदारी है। यदि विपक्ष को लगे कि उसकी बात सुनी जा रही है तो सदन में टकराव की तीव्रता कम हो सकती है।
संसद को चलाना केवल सभापति, अध्यक्ष या संसदीय कार्य मंत्रालय की जिम्मेदारी नहीं है। यह प्रत्येक सांसद की सामूहिक जिम्मेदारी है। जिस क्षण कोई सांसद सदन में प्रवेश करता है, उसी क्षण वह केवल अपने दल का प्रतिनिधि नहीं रहता, बल्कि पूरे देश की जनता का प्रतिनिधि बन जाता है। इसलिए उसके व्यवहार में राजनीतिक प्रतिबद्धता के साथ संसदीय मर्यादा और राष्ट्रीय उत्तरदायित्व भी दिखाई देना चाहिए।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों संसद की गरिमा को सर्वोच्च प्राथमिकता दें। विपक्ष को विरोध का अधिकार मिले, सरकार को जवाब देने की बाध्यता हो और जनता को सार्थक बहस देखने का अवसर मिले। लोकतंत्र में जीत केवल सरकार की जीत नहीं होती और हार केवल विपक्ष की हार नहीं होती। यदि संसद चलती है तो देश जीतता है और यदि संसद ठप होती है तो अंततः जनता हारती है।
संसद में हंगामा करके कुछ समय के लिए राजनीतिक संदेश जरूर दिया जा सकता है, लेकिन दीर्घकाल में इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति विश्वास कमजोर होता है। इसलिए विपक्ष को अपने विरोध के तरीकों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए और सरकार को भी संवाद का रास्ता अधिक व्यापक बनाना चाहिए। देश आज अनेक गंभीर चुनौतियों के बीच खड़ा है। ऐसी स्थिति में संसद को संघर्ष का अखाड़ा नहीं, समाधान का मंच बनना चाहिए। लोकतंत्र की असली ताकत सदन को बंद कराने में नहीं, बल्कि सदन के भीतर अपनी बात कहने और दूसरे की बात सुनने में है। यही संसदीय मर्यादा है, यही जनादेश का सम्मान है और यही देशहित की वास्तविक मांग भी है।
— महेन्द्र तिवारी
