कविता

क्यों न खुश होकर जिया जाए!

विधा- कविता
शीर्षक- क्यों न खुश होकर जिया जाए!

सुख आमंत्रित हैं, आहूत हैं,
आते भी हैं,
हर्षाते भी हैं,
पर जब तक होते हैं,
उनका एहसास कम हो पाता है।

दुःख, कष्ट, संघर्ष अनाहूत हैं,
पर थोड़े भी बहुत ज्यादा लगते हैं,
सताते हैं, गमगीन करते हैं,
अनिमंत्रित अतिथि की भांति,
बेज़ार-से लगते हैं।

अतिथि आहूत हों या अनाहूत,
मन से या बेमना,
उसका स्वागत करना ही होता है,
अच्छे-बुरे दिनों की तरह,
आहूत-अनाहूत अतिथि भी
विदा हो जाते हैं।

सुख का स्वागत तो
हम मुस्कुराकर करते हैं,
क्यों न अनाहूत अतिथियों
दुःख, कष्ट, संघर्ष का स्वागत भी,
मुस्कुराकर किया जाए,
खुश होकर जिया जाए!
स्वरचित और मौलिक
लीला तिवानी
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244