क्यों न खुश होकर जिया जाए!
विधा- कविता
शीर्षक- क्यों न खुश होकर जिया जाए!
सुख आमंत्रित हैं, आहूत हैं,
आते भी हैं,
हर्षाते भी हैं,
पर जब तक होते हैं,
उनका एहसास कम हो पाता है।
दुःख, कष्ट, संघर्ष अनाहूत हैं,
पर थोड़े भी बहुत ज्यादा लगते हैं,
सताते हैं, गमगीन करते हैं,
अनिमंत्रित अतिथि की भांति,
बेज़ार-से लगते हैं।
अतिथि आहूत हों या अनाहूत,
मन से या बेमना,
उसका स्वागत करना ही होता है,
अच्छे-बुरे दिनों की तरह,
आहूत-अनाहूत अतिथि भी
विदा हो जाते हैं।
सुख का स्वागत तो
हम मुस्कुराकर करते हैं,
क्यों न अनाहूत अतिथियों
दुःख, कष्ट, संघर्ष का स्वागत भी,
मुस्कुराकर किया जाए,
खुश होकर जिया जाए!
स्वरचित और मौलिक
लीला तिवानी
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया
