शहज़ादी की आवाज़
दिल्ली की वह शाम कुदरत का कोई नायाब करिश्मा थी। आसमान सुर्ख लाल रंग में रंगा था और हवाओं में सोने के कणों सी चमकती गर्द उड़ रही थी। यमुना का किनारा किसी टूटे हुए ख्वाब की तरह हसीन लग रहा था, जैसे रेत पर किसी मोर के पंख बिखरे हों, सुंदर मगर अधूरे।
मुहम्मद शाह रंगीला की सबसे छोटी बेटी, शहज़ादी जहाँआरा बेगम अपनी बालकनी के संगमरमरी खंभों के सहारे खड़ी थी। उम्र महज़ सोलह साल, पर चेहरा किसी पुरानी आयत की तरह गंभीर। उसकी आँखों में वह चमक नहीं थी जो एक अल्हड़ शहज़ादी में होनी चाहिए, बल्कि वहाँ एक अजीब सी परिपक्वता और उदासी का संगम था। ऐसा लगता था मानो उस सोलह साल की लड़की ने अपनी आँखों के झरोखे से आने वाले कल के किसी धुंधले तूफ़ान को पढ़ लिया हो।
उसके हाथ में मीर तक़ी मीर की ग़ज़लें थीं। किताब खुली थी, पन्ने हवा से फड़फड़ा रहे थे, पर उसका ध्यान मीर की ग़ज़लों में नहीं था। वह खिड़की से बाहर लाल किले की दीवारों पर पसरती स्याह शाम को देख रही थी। उसे डर था कि यह शाम अब कभी ख़त्म नहीं होगी। सल्तनत की नींव खोखली हो चुकी थी। जहाँ मशविरे होने चाहिए थे, वहाँ शराब का दौर चलता था। सिपाही बदहाल थे, खज़ाना खाली था, और उत्तर-पश्चिम की सरहदों से आने वाली ख़बरें किसी दुःस्वप्न की तरह थीं।
उन दिनों दिल्ली की गलियों और चौपालों पर नादिर शाह का नाम किसी ज़हरीले साँप की फुफकार की तरह रेंग रहा था। हर नुक्कड़, हर महफ़िल में बस उसी का ज़िक्र था। कोई उसकी टिड्डी दल जैसी फ़ौज के किस्से सुनाकर डरा रहा था, तो कोई काबुल की बर्बादी की गवाही दे रहा था। सबसे ज़्यादा दहशत उस किंवदंती से थी कि वह कोई पुश्तैनी बादशाह नहीं, बल्कि एक मामूली गड़रिया था जिसने खून की नदियाँ बहाकर ईरान के सिंहासन पर कब्ज़ा जमाया था।
जहाँआरा ने आँखें बंद कीं। हवा में गुलाब की महक थी। लेकिन तभी एक सर्द झोंके के साथ उसे कुछ और महसूस हुआ। हवा में लोहे और ताजे ख़ून की एक तीखी गंध तैर रही थी। वह सिहर उठी। उसे इस बात का रत्ती भर भी गुमान न था कि जिस रक्त की गंध उसे विचलित कर रही है, वह किसी अजनबी का नहीं, बल्कि उसके अपने खानदान और वजूद का होगा।
सन 1739 ईस्वी। कर्नाल का वह मनहूस मैदान। आसमान धूल की उस मोटी चादर से ढका था जो सूरज को निगल चुकी थी। यह महज मिट्टी नहीं थी, यह वह गर्द थी जो फेफड़ों में उतरकर दम घोंट देती है। सामने मुगल सेना खड़ी तो थी, पर उसमें वह रौब नहीं था। वे बिखरे हुए थे जैसे किसी बुझी हुई आग के वे आखिरी अंगारे, जो राख होने की कगार पर हों।
नादिर शाह अपने ऊँचे ईरानी घोड़े पर बुत बना बैठा था, अचल और अडिग। उसकी आँखें किसी भूखे बाज़ की तरह पीली और नुकीली थीं, जो मीलों दूर से भी शिकार की धड़कनें पढ़ लेती हैं। उन आँखों में न कोई दया थी, न कोई उत्तेजना। बस एक सर्द और जानलेवा बेपरवाही थी। उसने देखते ही देखते अपने सूखे होंठों पर एक हल्की सी मुस्कुराहट तैरा दी। वह मुस्कुराहट किसी इंसान की नहीं, बल्कि उस शिकारी की थी जिसे पता है कि शिकार लहूलुहान है, थक चुका है और अब भागने की तमाम दिशाएँ बंद हो चुकी हैं। उसके लिए यह युद्ध नहीं, महज़ एक रस्म थी, एक साम्राज्य को मिट्टी में मिलाने की रस्म।
बाहर हिंद की नियति का फैसला हो रहा था, लेकिन मुहम्मद शाह रंगीला अपने महल में बैठा शराब पी रहा था। तभी गलियारों में भागते कदमों की आहट हुई और शिकस्त की वह मनहूस खबर उस तक पहुँची। जैसे ही पराजय शब्द उसके कानों से टकराया, सम्राट के चेहरे पर फैला मदहोशी का रंग फक पड़ गया। वह कीमती स्वर्ण पात्र, जो मुगलिया शान और बेफिक्री का आखिरी गवाह था, उसकी पकड़ से छूट गया। संगमरमर के ठंडे फर्श पर वह प्याला गिरा और उसके टुकड़े हर दिशा में बिखर गए। वह आवाज़ केवल एक पात्र के टूटने की नहीं थी। वह मुगलिया इकबाल के बिखरने की गूँज थी। लाल मदिरा सफेद फर्श पर इस तरह फैल गई जैसे कोई गहरा जख्म बह निकला हो।
लाल किले के दीवान-ए-ख़ास में, जहाँ कभी शाहजहाँ की हुकूमत का डंका बजता था, वहाँ अब नादिर शाह ने अपना डेरा डाला। शहंशाह मुहम्मद शाह को एक अपराधी की तरह उसके सामने पेश किया गया। नादिर की बर्फीली आँखों ने उसे ऊपर से नीचे तक तौला और फिर एक कड़कती आवाज़ ने किले की दीवारों को हिला दिया। “हिंदुस्तान का खज़ाना खोलो!”
तख़्त-ए-ताऊस, जिस पर बैठकर सात मुग़ल बादशाहों ने आधी दुनिया पर राज किया था, आज किसी मामूली असबाब की तरह नादिर के सामने घसीटा गया। मोतियों की अंतहीन मालाएँ, सोने के सिक्कों का पहाड़, बेशकीमती जवाहरात, नायाब किताबें और पूर्वजों की तलवारें, सब कुछ बेरहमी से लूटा जा रहा था। यह सिर्फ़ धन की लूट नहीं थी। यह एक तहज़ीब की कमर तोड़ी जा रही थी।
लेकिन नादिर शाह की आँखें किसी और चीज़ पर थीं। उसने पूछा: “जहाँआरा बेगम कहाँ है, रंगीला की बेटी?” दरबारी ने घबराकर जवाब दिया: “वह अंदरूनी महल में हैं।” नादिर ने तलवार उठाई और बोला: “मेरे सामने लाओ।”
जहाँआरा ने चेहरे पर पानी के छींटे मारकर अपना चेहरा धोया, मानो वह अपने अतीत के आखिरी निशानों को मिटा रही हो। हाथों पर लगा गाढ़ा महवर उसकी बेचारगी पर तंज कस रहा था। उसने काँपते हाथों से सफेद मलमल का दुपट्टा ओढ़ा, एक ऐसा कफन जो अभी साँस ले रहा था। उसके कदम बोझिल थे, फर्श पर उनकी आहट ऐसी गूँज रही थी जैसे कोई अपनी ही मज़ार की सीढ़ियाँ उतर रहा हो।
जब वह दरबार में आई, तो पूरा दरबार चुप हो गया। नादिर ने कहा: “मैं तुमसे निकाह करूँगा।” जहाँआरा के होंठ सिले हुए थे। उसने अपनी गरिमा को ढाल की तरह ओढ़ लिया और अपनी दृष्टि सीधे नादिर की आँखों में गाड़ दी। उसने वहाँ जो देखा, वह कोई मानवीय भावना नहीं थी। वह थी जलत। नादिर की आँखों में एक ऐसा उन्माद नाच रहा था जो केवल पाने की भूख जानता है।
निकाह का इंतज़ाम किया गया। मौलवी ने जहाँआरा की ओर से सात पुश्तों का बयान पढ़ा। “अमीर तैमूर से शुरू होकर बाबर, हुमायूँ, जलालुद्दीन अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ और अब सुल्तान मुहम्मद शाह।” एक एक नाम के साथ मुगलिया सल्तनत की सदियों पुरानी शान दरबार की दीवारों से टकराकर गूँज रही थी। फिर कुछ दरबारियों की शरारत सूझी और मौलवी ने नादिर से भी पूछ लिया।
दरबार में सन्नाटा पसर गया। नादिर की आँखों में वह पीली वहशी आग भभक उठी। उसने तलवार खींची। धातु के रगड़ने की तीखी आवाज़ पूरे हॉल में किसी चीख की तरह गूँजी। उसने गरजती आवाज़ में कहा: “नादिर शाह इब्न शमशीर, इब्न शमशीर, इब्न शमशीर, इब्न शमशीर! तलवार! तलवार का बेटा, तलवार के पोते का बेटा! मेरी सात पुश्तें और मेरा पूरा खानदान यह फौलाद है। इसी ने मुझे तख्त दिया है और यही मेरा वजूद है!” मौलवी ने तुरंत बोला: “क़ुबूल है, क़ुबूल है, क़ुबूल है! निकाह हो गया!”
लूट का सामान लादकर नादिर शाह वापस लौट गया। जहाँआरा को एक पालकी में बिठाया गया। पालकी में वह अकेली थी। उसके पीछे दिल्ली थी और आगे एक अज्ञात रेगिस्तान, बिना पानी के, बिना पेड़ के, बिना घर के। दिल्ली धीरे धीरे छोटी होती जा रही थी जैसे कोई सपना जो आँख खुलते ही टूट जाए। उसने एक बूँद भी आँसू नहीं बहाया।
ईरान में उसे एक बड़े महल में रखा गया। लेकिन वह ख़ाली था। दीवारें सजी हुई थीं, पर उन पर कोई पन्ना नहीं था, ना ज़बान का, ना आँखों का। नौकरानियाँ उसकी ज़ुबान नहीं समझती थीं। खाने में दिल्ली का ज़ायक़ा नहीं था, कपड़ों में गुलाब की महक नहीं थी। जहाँआरा धीरे धीरे सूखती गई जैसे कोई फूल जिसे पानी ना मिले।
एक रात नादिर ने पूछा: “तुम रोती क्यों नहीं हो?” जहाँआरा ने जवाब दिया: “क्योंकि मेरे पास रोने के लिए आँसू नहीं बचे। मैंने सब कुछ दिल्ली में ही रो दिया।”
जहाँआरा बीमार पड़ गई। कोई दवाई उस बीमारी को ठीक नहीं कर सकती थी क्योंकि उसकी बीमारी शरीर में नहीं थी, उसकी बीमारी आत्मा में थी। उसकी आत्मा दिल्ली में थी, यमुना के किनारे, लाल किले की छत पर, मीर तक़ी मीर की किताब के पन्नों पर।
उसकी आख़िरी रात ऐसी थी जिसे कोई शब्द नहीं बयान कर सकता। बाहर ईरान की ठंडी और सूनी रात थी। अंदर जहाँआरा की साँसें धीमी होती जा रही थीं। उसने आँखें बंद कीं और दिल्ली देखी। यमुना बह रही थी, मोर नाच रहे थे, गुलाब खिले हुए थे, लाल किला चमक रहा था। और वह बालकनी में बैठी थी अपनी पसंदीदा किताब के साथ। एक मुस्कुराहट उसके होंठों पर आई, पहली और आख़िरी मुस्कुराहट जो उसने ईरान में दी। फिर उसने अपनी आख़िरी साँस ली।
जहाँआरा को ईरान के एक छोटे से क़ब्रिस्तान में दफ़नाया गया। कोई ताज़िया नहीं निकाला गया, कोई मातम नहीं मनाया गया। क्योंकि वह एक विदेशी थी, एक लूट का सामान। और लूट के सामान की क़ब्र पर कोई फूल नहीं चढ़ाता।
लेकिन क़ब्रिस्तान के पास रहने वाले लोगों ने कुछ देखा। हर रात जब ईरान का आसमान काला होता और चाँद छिप जाता, जहाँआरा की कब्र से आवाज़ें आतीं। क्रन्दन, रोना, एक ऐसा रोना जो किसी किशोरी का हो। ना चीख, ना गुस्सा, बस एक साफ़, शुद्ध, दिल तोड़ने वाला रोना। कभी कभी वह आवाज़ कुछ कहती थी धीमी, बिखरी हुई, टूटी टूटी आवाज़ में। “अम्मी… अब्बा… दिल्ली… यमुना…”
क़ब्रिस्तान का चौकीदार रज़ा हर रात यह सब सुनता। शुरू में डर लगता था, फिर तकलीफ़ होती थी, फिर एक दिन उसे भी रोना आ गया। क्योंकि उसने समझ लिया कि यह कोई भूत प्रेत नहीं है। यह एक बेटी की आवाज़ है जो अपने घर को याद कर रही है। रज़ा ने एक दिन कब्र पर एक गुलाब का फूल रखा। अगली रात क्रन्दन थोड़ा कम हुआ। उसने फिर फूल रखा। फिर फूल रखा। वह रोज़ फूल रखने लगा।
ईरान में एक भारतीय विद्वान प्रोफेसर हरिश्चंद्र था। उसे क़ब्रिस्तान के क्रन्दन के बारे में पता चला। वह देखने भी गया। उसने वही क्रंदन सुना और फिर भारत के एक दोस्त को चिट्ठी लिखी। “मेरे प्यारे दोस्त, मैं वहाँ गया जहाँ जहाँआरा बेगम दफ़न है। मैंने जो सुना वह तुम्हें बता रहा हूँ। यह कोई कहानी नहीं है, यह सच है। हर रात उसकी कब्र से आवाज़ें आती हैं। वह दिल्ली माँगती है, यमुना माँगती है, अपने अब्बा की आवाज़ माँगती है। और हम? हमने तख़्त-ए-ताऊस और कोहिनूर को याद किया, लेकिन जहाँआरा को किसी ने याद नहीं रखा। हम चीज़ों को याद तो रखते हैं, इंसानों को नहीं। तुम्हारा हरिश्चंद्र।”
ईरान की धूल भरी सरज़मीं पर आज भी वह मज़ार मौजूद है। उसके ऊपर एक पत्थर है, बेनाम, खामोश और वक्त की मार से घिसा हुआ। राहगीर वहां से गुजरते हैं, मगर कोई नहीं जानता कि इस बेजान पत्थर के नीचे एक सल्तनत की शहजादी की गरिमा दफ़न है। ईरान के आसमान पर जब स्याह रात अपनी चादर फैलाती है, तो फिज़ाओं में एक अजीब सी हलचल होने लगती है। कभी वह किसी ऊँची चीख़ की तरह सन्नाटे को चीरती है, तो कभी किसी ठंडी आह की तरह कानों में घुल जाती है। पर शब्द हमेशा वही रहते हैं। “दिल्ली… मेरा वजूद… मुझे दिल्ली ले चलो…”
जहाँआरा कभी मरी ही नहीं। वह तो उस ‘आवाज़’ में तब्दील हो गई है जो हर उस इंसान के भीतर गूँजती है जिसका घर उससे छीन लिया गया हो। वह आवाज़ जो बताती है कि साम्राज्य ढह सकते हैं, सिंहासन लूटे जा सकते हैं, पर एक रूह की अपने वतन के लिए तड़प कभी खामोश नहीं की जा सकती।
शहज़ादी की वह आवाज़ आज भी दिल्ली की तलाश में भटक रही है… और शायद हमेशा भटकती रहेगी।
— महेन्द्र तिवारी
