निजी क्षेत्र का न्यूनतम वेतन सरकारी क्षेत्र के बराबर हो
एक ही शहर में, एक ही डिग्री और एक ही काम के लिए दो अलग-अलग वेतन क्यों होने चाहिए, यह सवाल अब अनदेखा नहीं किया जा सकता। एक सरकारी कार्यालय में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी का शुरुआती वेतन आज भत्तों को मिलाकर पच्चीस हजार रुपये से कम नहीं है, जबकि उसी शहर की एक निजी कंपनी में, उसी योग्यता के साथ, दिन में दस घंटे काम करने वाले कर्मचारी को दस से बारह हजार रुपये पर हस्ताक्षर करने पड़ते हैं। यह केवल आंकड़ों का अंतर नहीं है, यह दो भारत बनने की कहानी है। एक भारत जिसे राज्य ने सुरक्षित कर रखा है और दूसरा भारत जो बाजार की दया पर छोड़ दिया गया है।
इस असमानता का बचाव अक्सर इस तर्क से किया जाता है कि सरकारी नौकरी की भर्ती प्रक्रिया कठिन है और निजी क्षेत्र में दक्षता के अनुसार वेतन मिलता है। यह तर्क सतह पर सही लगता है, पर सच्चाई यह है कि आज निजी क्षेत्र दक्षता का नहीं, सस्ते श्रम का लाभ उठा रहा है। जिस देश में निजी क्षेत्र सकल घरेलू उत्पाद का सत्तर प्रतिशत से अधिक पैदा करता है, वहां उसी क्षेत्र के श्रमिक को न्यूनतम जीवन स्तर से भी नीचे रखा जाना किसी भी आर्थिक तर्क से उचित नहीं ठहराया जा सकता।
हमारे संविधान ने इस स्थिति की कल्पना पहले ही कर ली थी। अनुच्छेद 39 में समान काम के लिए समान वेतन और अनुच्छेद 43 में सभी कामगारों के लिए निर्वाह योग्य मजदूरी की बात कही गई है। राज्य एक आदर्श नियोक्ता के रूप में जब यह मान लेता है कि महंगाई के इस दौर में अठारह हजार रुपये से कम में किसी परिवार का गुजारा संभव नहीं, तो फिर वह उसी महंगाई का सामना कर रहे निजी कर्मचारी के लिए यह मानक क्यों बदल देता है? सरकार का वेतन आयोग केवल सरकारी कर्मचारियों के लिए नहीं, बल्कि देश में वेतन का एक मानक तय करने के लिए भी होना चाहिए।
आमतौर पर कहा जाता है कि यदि निजी क्षेत्र में वेतन बढ़ाया गया तो उद्योगों पर बोझ बढ़ेगा और रोजगार घटेगा। यह डर अतिरंजित है। कम वेतन से उद्योग को तात्कालिक लाभ भले ही दिखे, पर दीर्घकाल में वह खुद ही अपना नुकसान करता है। कम वेतन पाने वाला कर्मचारी न तो मन से काम करता है, न अपनी कुशलता बढ़ाने में निवेश करता है और न ही बाजार में उपभोक्ता के रूप में खर्च कर पाता है। उसकी क्रय शक्ति का न होना अंततः उसी बाजार को कमजोर करता है जिसके लिए उद्योग उत्पादन कर रहा है। जब करोड़ों हाथों में पैसा होगा, तभी तो दुकानों में बिक्री होगी। सम्मानजनक वेतन खर्च नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था में निवेश है।
आज देश के युवा में सरकारी नौकरी के प्रति जो असाधारण आकर्षण है, उसका एक बड़ा कारण यही वेतन असमानता है। प्रतिभा सरकारी दफ्तरों की ओर भाग रही है, इसलिए नहीं कि वहां काम अधिक सृजनात्मक है, बल्कि इसलिए कि वहां जीवन अधिक सुरक्षित है। यदि निजी क्षेत्र में भी न्यूनतम सम्मानजनक वेतन सुनिश्चित हो जाए, तो यह अनावश्यक भीड़ कम होगी और युवा अपनी रुचि के अनुसार, भय के बिना, निजी क्षेत्र में भी अपना भविष्य देख सकेंगे।
इसका अर्थ यह नहीं कि कल सुबह से ही हर छोटी दुकान को केंद्र सरकार के वेतनमान का पालन करने के लिए कहा जाए। यह व्यावहारिक नहीं है। आवश्यकता एक स्पष्ट और चरणबद्ध राष्ट्रीय नीति की है। देश में एक राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन तय होना चाहिए जो किसी भी राज्य, किसी भी क्षेत्र में सरकारी समूह-ग के प्रारंभिक वेतन से कम न हो और जिसे जीवन-यापन की लागत से जोड़ा जाए। जो कंपनियां इस मानक का पालन करें, उन्हें कर में रियायत और सरकारी खरीद में प्राथमिकता जैसे प्रोत्साहन दिए जाएं। साथ ही, भविष्य निधि, कर्मचारी राज्य बीमा और वेतन भुगतान में पारदर्शिता जैसे बुनियादी कानूनों का पालन कठोरता से कराया जाए, क्योंकि आज भी लाखों कर्मचारी इन अधिकारों से वंचित हैं।
विकसित भारत का निर्माण केवल कुछ लाख सरकारी कर्मचारियों से नहीं होगा। उसे बनाएंगे वे करोड़ों निजी हाथ जो कारखानों में, स्कूलों में, अस्पतालों में, सड़कों पर और कंप्यूटर के सामने रोज देश को चला रहे हैं। यदि हम उनके श्रम का मूल्य नहीं समझेंगे, तो हम समानता और न्याय के अपने संवैधानिक वादे से पीछे हट रहे हैं। न्यूनतम वेतन में बराबरी कोई दया नहीं, यह एक कामगार का हक है।
— डॉ. शैलेश शुक्ला
