काँच के बर्तन
अम्मा को, जब से हमने होश संभाला था, बस एक ही बात बार-बार दोहराते देखा था—
“अच्छी चीज़ को रोज़ इस्तेमाल नहीं करते। संभालकर रख दो… कहीं आने-जाने के लिए।”
उनके लिए हर अच्छी चीज़ का एक खास अवसर होता था और उस खास अवसर के लिए वह चीज़ हमेशा संभालकर रख दी जाती थी।
बाबू जी जब भी उनके लिए नई साड़ी लाते, अम्मा उसे पहनने के बजाय बड़े करीने से तह करके अलमारी में रख देतीं।
एक दिन बाबू जी ने पूछा था,
“अरे, साड़ी पसंद नहीं आई क्या?”
अम्मा ने हैरानी से उनकी ओर देखा,
“अरे नहीं, बहुत अच्छी है।”
“तो पहनती क्यों नहीं?”
“अभी कहाँ पहननी है?”
बाबू जी हँसते हुए कहते,
“साड़ी पहनने के लिए कहीं जाना जरूरी है क्या?”
अम्मा मुस्करा देतीं,
“तुम नहीं समझोगे। कहीं अच्छा-सा जाना होगा तो पहन लेंगे।”
फिर कहीं जाना आता, तो अम्मा पुरानी साड़ी निकाल लेतीं।
हम पूछते,
“अम्मा, नई वाली पहन लो न!”
तो वह कहतीं,
“अरे, वहाँ इतनी अच्छी साड़ी पहनकर क्या करना है? फिर कभी पहन लेंगे।”
और वह फिर कभी कभी आता ही नहीं था।
नई साड़ी अलमारी में ही पड़ी रहती।
नई चप्पल का भी यही हाल था। हम कई बार देखते कि अम्मा की पुरानी चप्पल का तलवा घिस चुका है, पट्टी भी ढीली हो गई है, लेकिन नई चप्पल डिब्बे में सुरक्षित रखी है।
“अम्मा, नई वाली क्यों नहीं पहनतीं?” हम पूछते।
तो उनका एक ही जवाब होता—
“अभी ठीक है ये। नई वाली कहीं बाहर जाने के लिए रखी है।”
“और बाहर कब जाना है?”
“जब जाना होगा तब देखेंगे।”
हमें बचपन में अम्मा की यह आदत समझ नहीं आती थी। लगता था, कोई चीज़ अगर अच्छी है तो उसे इस्तेमाल करने में क्या बुराई है?
लेकिन अम्मा का मन मानता ही नहीं था।
शायद अभाव में पली उस पीढ़ी ने चीज़ों को पाने से ज्यादा, उन्हें बचाकर रखना सीखा था।
और अम्मा को काँच के बर्तनों का तो जैसे विशेष मोह था।
उस समय सुंदर-सुंदर क्रॉकरी घर में होना अपने आप में बहुत बड़ी बात मानी जाती थी। कोई रिश्तेदार विदेश से कोई बोन चाइना का कप दे जाए, कोई बाबू जी के साथ घूमने जाए और वहाँ से कोई नाज़ुक काँच का सेट खरीद लाए—तो अम्मा की खुशी का ठिकाना नहीं रहता।
लेकिन जितनी खुशी उन्हें उन चीज़ों को पाकर होती थी, उससे कहीं ज्यादा डर उन्हें उनके टूट जाने का रहता था।
उनकी अलमारी में एक सुंदर टी-सेट था। सफेद कपों पर हल्के गुलाबी फूल बने थे और उनके किनारों पर सुनहरी धार थी। एक लेमन-सेट था जिसमें पतले-पारदर्शी गिलास थे। एक डिनर-सेट था जिसे अम्मा बहुत कम बाहर निकालती थीं।
वे बर्तन हमारे घर के सदस्य जैसे थे, बस फर्क इतना था कि उन्हें छूने की इजाज़त किसी को नहीं थी।
हम बहनों की नजर जब भी उस अलमारी पर पड़ती, मन ललचा जाता।
एक दिन मैंने कहा था,
“अम्मा, आज इसी कप में चाय पी लें?”
अम्मा तुरंत चौकन्नी हो गईं।
“नहीं बेटा, टूट जाएगा।”
“तो हम संभालकर पीएँगे।”
“नहीं, रोज़-रोज़ इस्तेमाल करने की चीज़ नहीं है।”
“तो किस दिन इस्तेमाल होगी?”
हमारे इस सवाल का कोई स्पष्ट जवाब उनके पास नहीं होता।
बस इतना कहतीं—
“जब कोई खास आएगा।”
“कौन खास?”
“अरे, कोई भी…”
“कब आएगा?”
अम्मा हमें हल्की-सी डाँट देतीं,
“बहुत सवाल मत किया करो।”
कौन खास आएगा और कब आएगा, यह बात शायद अम्मा खुद भी नहीं जानती थीं।
कभी-कभी त्योहारों पर अलमारी खुलती। बर्तनों को एक-एक करके बाहर निकाला जाता। धोया जाता। चमकाया जाता। हमसे भी कपड़ा लगवाया जाता।
और अम्मा की आवाज़ पीछे-पीछे चलती रहती—
“आराम से रखना।”
“धीरे रखना।”
“वो वाला कप अलग रखना।”
“अरे, इतना जोर से मत रखो।”
“टूट जाएगा बेटा…”
हम सब बहनों को कभी-कभी हँसी भी आती।
“अम्मा, ये बर्तन इस्तेमाल करने के लिए हैं या बस देखने के लिए?”
अम्मा मुस्करा देतीं।
“तुम लोग क्या जानो! बड़ी मुश्किल से जुटाया है।”
उस एक वाक्य में शायद उनकी पूरी जिंदगी छिपी थी।
हमने चीज़ों को बस चीज़ों की तरह देखा था।
उन्होंने उन्हें पाने के पीछे की मेहनत देखी थी।
कभी अम्मा कपों को हाथ में लेकर कहतीं,
“तुम लोगों को सब आसानी से मिल जाता है, इसलिए कीमत नहीं समझते।”
तब हमें उनकी बात समझ नहीं आती थी।
हम बस इतना जानते थे कि अलमारी में बहुत सुंदर बर्तन हैं, जिनमें हम कभी चाय नहीं पी सकते।
फिर समय धीरे-धीरे बीतता गया।
हम बच्चे बड़े होने लगे। स्कूल से कॉलेज पहुँच गए। घर का आँगन, जो कभी हमारी आवाज़ों से भरा रहता था, धीरे-धीरे शांत होने लगा।
एक बेटी पढ़ाई के लिए बाहर चली गई, दूसरी अपनी दुनिया में व्यस्त हो गई।
फिर बाबू जी का तबादला अमृतसर हो गया।
घर वही था।
दीवारें वही थीं।
अलमारी वही थी और उसके भीतर रखे काँच के बर्तन भी वैसे ही सुरक्षित थे।
बस उन्हें घेरे रहने वाले लोग कम हो गए थे।
अब अम्मा अक्सर अकेली होतीं।
चार लोगों के भरे-पूरे घर में कभी जो सुबह चाय के लिए कई कप निकलते थे, वहाँ अब कई बार अम्मा अकेले ही चाय पीती थीं।
लेकिन वह सुंदर टी-सेट आज भी अलमारी में था।
डिनर-सेट भी।
लेमन-सेट भी।
सब कुछ बिल्कुल सुरक्षित।
अम्मा आज भी स्टील की प्लेट में खाना खातीं और सुंदर डिनर-सेट को संभालकर रखतीं।
चाय पुराने साधारण कप में पीतीं और टी-सेट किसी खास मेहमान के इंतज़ार में रहता।
कभी कोई आता भी, तो अम्मा सोचतीं—
“अरे, इनके लिए क्या निकालना!”
और बर्तन फिर अलमारी में ही रह जाते।
एक दिन अम्मा की बड़ी बेटी कॉलेज की छुट्टियों में घर आई।
उसके इम्तिहान खत्म हो गए थे और वह एक हफ्ते के लिए अम्मा के साथ रहने आई थी।
अम्मा बहुत खुश थीं।
सुबह उठते ही बेटी के लिए नाश्ता बनाना, उसकी पसंद की चीज़ें तैयार करना, उसके कपड़े ठीक करना—जैसे अचानक घर में फिर से जान आ गई थी।
उसकी आवाज़ से कमरों में रौनक लौट आई थी।
अम्मा बार-बार रसोई से आवाज़ देतीं—
“बेटा, चाय पीएगी?”
“नहीं अम्मा, अभी नहीं।”
थोड़ी देर बाद फिर पूछतीं—
“कुछ खा लेगी?”
बेटी हँसकर कहती—
“अम्मा, आप मुझे चैन से बैठने भी दोगी?”
अम्मा भी हँस देतीं।
“इतने दिन बाद आई है, तो पूछेंगे भी नहीं?”
उस दिन सुबह न जाने क्या सोचकर बेटी ने रसोई में चाय बनाई और फिर सीधे उस अलमारी के पास चली गई, जिसे खोलने से पहले हम सबकी नजर अम्मा की तरफ जाती थी।
उसने टी-सेट निकाला।
एक कप में अपने लिए चाय डाली और एक प्याला अम्मा के सामने रख दिया।
अम्मा कुछ क्षण तक उस कप को देखती रहीं।
फिर बेटी को।
उनकी आँखों में सवाल था—
“बेटा, आज ये सेट क्यों निकाल लिया?”
बेटी ने उनकी आँखों का प्रश्न पढ़ लिया।
वह मुस्कराई और बोली,
“बस ऐसे ही। आज आपकी बेटी घर आई है न, तो खास दिन है।”
अम्मा ने शायद पहली बार उस बात पर ध्यान नहीं दिया।
“हूँ… पर संभालकर पीना।”
“अम्मा!”
“अरे, कप टूट जाएगा।”
बेटी हँस पड़ी।
“कप है अम्मा, कोई बच्चा थोड़े ही है कि संभाल-संभालकर रखना पड़ेगा।”
अम्मा ने उसकी बात सुनी, मगर कुछ बोली नहीं।
उन्होंने भी चाय पी, मगर उनके मन में हल्की-सी चिंता बनी रही।
उन्हें लगता रहा कि कहीं कप टूट न जाए।
कहीं बेटी जल्दी में सिंक में रख दे।
कहीं हाथ से फिसल न जाए।
चाय खत्म होने के बाद बेटी ने कप उठाया और बहुत आराम से धोकर वापस रख दिया।
अम्मा ने राहत की साँस ली।
तभी बेटी का फोन बजा।
उसकी एक पुरानी सहेली उसी शहर में आई हुई थी और शाम को उससे मिलने घर आने वाली थी।
बेटी ने खुशी से अम्मा को बताया।
अम्मा के चेहरे पर भी खुशी आ गई।
अब उनके मन में एक नई तैयारी शुरू हो गई।
उन्होंने सोचा—
“अच्छा, बेटी की सहेली आएगी तो टी-सेट निकलेगा। लेमन-सेट में शरबत देंगे। शायद कुछ अच्छा-सा नाश्ता भी बना लें।”
शाम होने से पहले अम्मा ने रसोई ठीक की।
कुछ पकवान बनाने का मन हुआ।
फिर सोचा, “दो लड़कियाँ हैं, क्या इतना झंझट करना।”
फिर भी उन्होंने थोड़ा-बहुत तैयार कर लिया।
उसके बाद एक बार अलमारी खोलकर बर्तनों को देखा।
वह टी-सेट आज सुबह ही इस्तेमाल हुआ था, इसलिए उनके मन में आया कि शायद अब उसे फिर से निकाल ही लिया जाए।
उन्होंने कपों को देखा और धीरे से कहा—
“आज तो तुम्हारा दिन है।”
फिर खुद ही मुस्करा दीं।
शाम को दरवाजे की घंटी बजी।
बेटी की सहेली आ गई।
दोनों सहेलियाँ एक-दूसरे से मिलकर इतनी खुश हुईं कि घर जैसे अचानक उनकी हँसी से भर गया।
अम्मा दूर से दोनों को देख रही थीं।
उन्हें अपना पुराना घर याद आ रहा था।
वही चहल-पहल।
वही खिलखिलाहट।
वही किसी के आने पर होने वाली खुशी।
अम्मा रसोई की तरफ बढ़ीं ही थीं कि बेटी ने मोबाइल उठाया और कहा—
“चल, आज खाना बाहर से मँगाते हैं।”
सहेली ने कहा—
“हाँ यार, आंटी को भी आराम मिलेगा।”
दोनों हँस पड़ीं।
कुछ ही देर में पिज़्ज़ा ऑर्डर हो गया।
साथ में कोल्ड ड्रिंक भी।
अम्मा ने सोचा—
“चलो, कोल्ड ड्रिंक तो लेमन-सेट में दे देंगे।”
वह रसोई से गिलास निकालने ही जा रही थीं कि बेटी ने फ्रिज से बोतल निकाली और दोनों को डिस्पोजेबल गिलासों में डाल दिया।
“अरे बेटा…” अम्मा ने कुछ कहना चाहा।
बेटी ने पूछा—
“क्या हुआ?”
अम्मा ने बात बदल दी।
“कुछ नहीं।”
कुछ देर बाद पिज़्ज़ा भी आ गया।
डिब्बे खुल गए।
बेटियाँ बातें करती रहीं, हँसती रहीं, पुराने किस्से याद करती रहीं।
और अम्मा के काँच के बर्तन…
वे फिर अलमारी में धरे के धरे रह गए।
उस रात बेटी और उसकी सहेली बहुत देर तक बातें करती रहीं।
अम्मा भी उनके पास कुछ देर बैठीं।
बीच-बीच में दोनों लड़कियाँ अम्मा को अपने किस्सों में शामिल कर लेतीं और अम्मा हँस पड़तीं।
कितने दिनों बाद घर में ऐसी हँसी गूँजी थी।
लेकिन बीच-बीच में उनकी नजर उस अलमारी की तरफ चली जाती।
अगली सुबह बेटी वापस जाने की तैयारी कर रही थी।
घर फिर से वैसा ही होने वाला था—शांत।
अम्मा उसके कपड़े तह करके रख रही थीं।
अचानक उन्होंने धीरे से पूछा—
“बेटा, आजकल तुम लोगों के घर में कोई आता ही नहीं क्या?”
बेटी ने हँसते हुए कहा—
“आते हैं अम्मा, लेकिन अब कोई इतना तकल्लुफ कहाँ करता है। बाहर मिल लेते हैं, होटल चले जाते हैं या कुछ ऑर्डर कर लेते हैं।”
अम्मा कुछ देर चुप रहीं।
फिर बोलीं—
“हमारे समय में कोई आता था तो लगता था घर में त्योहार आ गया। उसके लिए अच्छे बर्तन निकालते थे। अच्छा खाना बनाते थे।”
बेटी ने मुस्कराकर कहा—
“तो आपने हमें इस्तेमाल करने कब दिया?”
अम्मा ने बेटी की ओर देखा।
बेटी ने यह बात मज़ाक में कही थी।
वह अपने कपड़े बैग में रखने लगी।
लेकिन अम्मा वहीं खड़ी रह गईं।
जैसे किसी ने अनजाने में उनके भीतर बहुत पुरानी कोई गाँठ खोल दी हो।
कुछ देर बाद उन्होंने धीमे से पूछा—
“तुम लोगों को सच में उन कपों में चाय पीने का मन होता था?”
बेटी ने सहज भाव से कहा—
“बहुत।”
“तो बताया क्यों नहीं?”
बेटी ने उनकी तरफ देखकर हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा—
“बताया तो था अम्मा… हर बार। आप ही कहती थीं—टूट जाएगा।”
अम्मा चुप हो गईं।
बेटी ने शायद पहली बार उनके चेहरे की उदासी देखी।
वह उनके पास आई और बोली—
“अरे, मैंने तो मज़ाक किया था।”
अम्मा ने बस इतना कहा—
“हूँ…”
लेकिन उस हूँ में बहुत कुछ था।
उस दिन बेटी के जाने के बाद अम्मा बहुत देर तक उस अलमारी के सामने खड़ी रहीं।
फिर उन्होंने उसे खोला।
एक-एक करके कप बाहर निकाले।
डिनर प्लेटों को देखा।
लेमन-सेट के गिलासों को रोशनी में घुमाकर देखा।
सब कुछ सुरक्षित था।
एक भी कप टूटा नहीं था।
एक भी गिलास चटका नहीं था।
सब कुछ वैसा ही था, जैसा सालों पहले था।
बस समय टूट गया था।
बच्चों का बचपन बीत गया था।
घर की चहल-पहल बीत गई थी।
वह उम्र बीत गई थी, जब सब एक साथ बैठकर चाय पीते थे।
अम्मा ने एक कप हाथ में लिया और बहुत देर तक उसे देखती रहीं।
फिर न जाने किससे बोलीं—
“काश… बच्चों को ही इन बर्तनों में चाय पिला दिया होता।”
शायद वह पहली बार था, जब अम्मा को लगा कि चीज़ें बचाते-बचाते उन्होंने पल खर्च होने दिए।
उन्हें डर था कि कप टूट जाएगा।
लेकिन यह नहीं सोचा था कि एक दिन वे हाथ ही दूर चले जाएँगे, जिनके लिए कप संभालकर रखे जा रहे हैं।
उन्हें लगा था कि अच्छी चीज़ें किसी खास दिन के लिए बचाकर रखनी चाहिए।
लेकिन अब उन्हें समझ आया कि शायद—
बच्चों का घर पर होना ही सबसे खास दिन था।
उनका सुबह उठकर चाय माँगना खास था।
उनका दोस्तों को घर लाना खास था।
उनका शोर मचाना खास था।
उनका कपों को उठाकर इधर-उधर रख देना खास था।
उनका कभी कोई कप तोड़ देना भी शायद खास था।
क्योंकि टूटा हुआ कप फिर खरीदा जा सकता था…
लेकिन बीता हुआ बचपन नहीं।
कुछ दिनों बाद दीपावली पर जब पूरा परिवार इकट्ठा हुआ तो तो बड़ी बेटी ने नोटिस किया कि अम्मा सुबह से ही बहुत खुश थीं।
बेटियाँ अपने-अपने कामों से छुट्टी लेकर आई थीं। घर में फिर वही पुरानी रौनक लौट आई थी। सुबह से रसोई में आवाज़ें थीं, कोई मिठाई चख रहा था, कोई सजावट में कमी निकाल रहा था, कोई पुराने किस्से सुना रहा था।
लेकिन उस दिन उन्होंने एक काम ऐसा किया, जिसने हम सबको चौंका दिया।
शाम को पूजा के बाद सब लोग बैठे ही थे कि अम्मा रसोई में गईं।
कुछ देर बाद जब वह चाय लेकर बाहर आईं, तो सबकी नजर एक साथ उनके हाथों पर चली गई।
वही सुंदर टी-सेट।
वही सफेद कप, जिन पर हल्के गुलाबी फूल बने थे और किनारों पर सुनहरी धार थी।
अम्मा एक-एक करके सबके हाथ में चाय देने लगीं।
कुछ क्षण के लिए जैसे किसी को विश्वास ही नहीं हुआ।
एक बहन ने हँसते हुए पूछा—
“अम्मा, आज कोई बहुत खास मेहमान आया है क्या?”
अम्मा ने उसकी ओर देखा।
फिर बहुत धीरे से बोलीं—
“हाँ… आए हैं न। मेरे अपने बच्चे।”
सब कुछ क्षण भर के लिए शांत हो गया।
किसी ने कुछ नहीं कहा।
शायद हम सबको एक साथ वह पुराना समय याद आ गया, जब इन्हीं कपों में चाय पीने की हमारी इच्छा पर अम्मा कहती थीं—
“नहीं बेटा, टूट जाएगा।”
बाबू जी ने कप हाथ में लेते हुए मज़ाक किया—
“अरे, संभालकर रखना सब लोग… ये बहुत कीमती हैं।”
अम्मा ने तुरंत उनकी ओर देखा।
फिर मुस्कराकर बोलीं—
“कीमती तो हैं… लेकिन तुम लोगों से ज्यादा नहीं।”
उस दिन चाय पीते हुए घर में फिर हँसी गूँजी।
किसी ने कप की तारीफ की।
किसी ने कहा कि इतने सालों बाद भी ये बिल्कुल नए जैसे हैं।
एक बहन ने मज़ाक में कहा—
“अम्मा, इतने साल अलमारी में पड़े रहे, आज भी बेचोगी तो नए ही लगेंगे।”
सब हँस पड़े।
लेकिन अम्मा की आँखें भर आईं।
उन्होंने धीरे से कहा—
“यही तो गलती कर दी मैंने… सब कुछ नया ही बचाकर रख दिया।”
फिर उन्होंने हम सबकी ओर देखते हुए कहा—
“अब जो चीज़ अच्छी लगेगी, उसे इस्तेमाल करेंगे। टूटेगी तो टूट जाएगी। लेकिन अब किसी खास दिन का इंतज़ार नहीं करेंगे।”
उस दिन हम सबने उन्हीं कपों में चाय पी।
कोई कप नहीं टूटा।
लेकिन अम्मा के भीतर वर्षों से जमा हुआ एक डर जरूर टूट गया था।
और शायद उसी के साथ यह समझ भी आई कि हम जीवन में सिर्फ चीज़ें ही अलमारी में बंद नहीं करते।
हम अपने कितने ही सपने भी संभालकर रख देते हैं।
हम सोचते हैं—
बच्चों की पढ़ाई पूरी हो जाए, फिर कहीं घूमने जाएँगे।
फिर कहते हैं—
बच्चों की नौकरी लग जाए, फिर आराम से जीएँगे।
फिर सोचते हैं—
थोड़ा पैसा और जमा हो जाए, फिर वह अच्छा-सा घर लेंगे।
थोड़ी फुर्सत मिल जाए, फिर पुराने दोस्तों से मिलेंगे।
काम का दबाव कम हो जाए, फिर अपने लिए जिएँगे।
और इस तरह जीवन भर हम हर खुशी के सामने एक शब्द लगा देते हैं—
“फिर…”
लेकिन वह फिर अक्सर कभी आता ही नहीं।
बच्चों की पढ़ाई खत्म होती है तो नौकरी की चिंता शुरू हो जाती है।
नौकरी लगती है तो शादी की तैयारी आ जाती है।
फिर बच्चों की अपनी जिम्मेदारियाँ शुरू हो जाती हैं।
और एक दिन हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो पता चलता है कि जिन लोगों के साथ घूमने का सपना देखा था, वे सब अपनी-अपनी दुनिया में बहुत दूर निकल चुके हैं।
जिस यात्रा को हम परिवार के साथ करने के लिए सालों से टालते रहे, उसके लिए अब सबके पास समय ही नहीं है।
तब समझ आता है कि सिर्फ नए कप, साड़ियाँ और चप्पलें ही नहीं—
हम अपने सपने भी अलमारियों में रख देते हैं।
यह सोचकर कि—
अभी नहीं… किसी अच्छे समय पर।
लेकिन जीवन का सबसे बड़ा सच शायद यही है कि कोई अच्छा समय अपने आप नहीं आता।
समय को अच्छा बनाना पड़ता है।
क्योंकि जिंदगी हमें बहुत बार बुलाती है—
कभी बच्चों की हँसी बनकर,
कभी माँ-बाबू जी के साथ बैठकर चाय पीने के बहाने,
कभी दोस्तों से मिलने के निमंत्रण के रूप में,
कभी किसी अधूरी यात्रा की इच्छा बनकर।
लेकिन हम कहते रहते हैं—
“अभी नहीं… बाद में।”
और फिर एक दिन वही बाद में हमारे सामने खड़ा होकर पूछता है—
“अब चलोगे?”
तब शायद हमारे पास समय होता है…
लेकिन वे लोग नहीं होते, जिनके साथ जाना था।
इसलिए शायद अच्छी चीज़ों को संभालकर रखने से ज्यादा जरूरी है—
अच्छे दिनों को पहचान लेना।
नई साड़ी पहन लेना।
सुंदर कप में चाय पी लेना।
अपनों को बुला लेना।
और जिस यात्रा का सपना वर्षों से देख रहे हैं…
उसके लिए एक दिन सचमुच निकल जाना।
क्योंकि चीज़ें टूटने से जीवन अधूरा नहीं होता।
लेकिन बहुत-से सपने बिना जीए रह जाएँ…
तो जीवन के भीतर एक खाली अलमारी हमेशा रह जाती है।
जिसमें सब कुछ सुरक्षित रखा होता है—
सिर्फ जीने के लिए समय नहीं बचता।
— प्रज्ञा पांडेय मनु
