ग़ज़ल
ख़ुशी चेहरे पे आंखों में नमी है
इसी का नाम शायद ज़िंदगी है
उसे जितना समझती हूं शनासा
वो उतना ही अभी तक अजनबी है
ग़मों की धूप में हम हंस रहे हैं
इसी का नाम तो ज़िंदादिली है
ज़मीं पर लड़ने वालो, ये समझलो
ज़मीं हर हाल में अल्लाह की है
ख़फ़ा क्यूं है ? कभी खुल कर बता दे
तेरी चाहत में”नमिता” ये कमी है
— नमिता राकेश
