चारपाई की अदालत
सुना है कि कर्मों का हिसाब- किताब
रखते हैं चित्रगुप्त
ईश्वर परिणाम घोषित करते हैं
और यमराज लागू
न जाने ये कितना सच है, कितना झूठ!
किंतु एक ठोस सच
हम सब देखे हैं
देख रहे हैं और आगे भी देखेंगे
हमारी साढ़े तीन हाथ की देह
घर के बाहरी कोने में
पौने चार हाथ की चारपाई पर
हो जाती है निढाल जब
करवट बदलने में बेहाल जब
लाचार असहाय और बदहाल जब
तब……
तब उस देह के कर्मों का हिसाब
चित्रगुप्त नहीं, ईश्वर नहीं
यमराज भी नहीं
संतानें लगाती हैं
साथी सहमते हैं, भाई झल्लाते हैं
मक्खियां भिनभिनाती हैं
बिस्तर पर हुई लीपा पोती
वारिस चींख चींखकर बताते हैं
परिजन धड़ल्ले से परिणाम सुनाते हैं
“बूढ़ा रात-दिन खांस खांसकर जीना मुश्किल कर दिया है
न जाने कब जाएगा
हम चैन से कब जी सकेंगे……”
चारपाई पर पड़ा
अतीत का सिकंदर
छुप छुपाकर आंसू बहाता है
जीवन भर का नास्तिक
गलकट, दबंग, लुटेरा, हकमार…..
चारपाई की अदालत में
अपनी देह छोड़ जाता है।
— डॉ. अवधेश कुमार अवध
