कविता

कविता

रिश्ते दारों के आपस में,
इस दरजा पुख़्ता नाते थे,
इक मेहमां जाने से पहले,
दो मेहमां घर में आते थे,
तब घर में रौनक़ रहती थी,
दादा हमको बतलाते थे।

सारी चीजें शुध पाते थे,
सस्ती क़ीमत पर लाते थे,
तब वो भी तन को लगता था,
जो रूखा सूखा खाते थे,
तब सबकी सेहत बेहतर थी,
दादा हमको बतलाते थे।

आपस में विश्वास था इतना ,
आपस में ऐसे नाते थे,
गाओं में लाखों के सौदे,
सिर्फ़ ज़बानी हो जाते थे,
तब मानव रब से डरता था ,
दादा हमको बतलाते थे।

टांगें पूरी फैलाते थे,
दाएं बाएं लहराते थे,
वो गाड़ी ख़ाली मिलती थी,
हम जिस में आते जाते थे,
तब आबादी बेहद कम थी,
दादा हमको बतलाते थे।

ना दौलत से डर पाते थे,
ना हाकिम से घबराते थे,
अपराधी को उसके मुंह पर,
वो अपराधी कह आते थे,
सच सब से ऊपर होता है,
दादा हमको बतलाते थे।

— अरुण शर्मा साहिबाबादी

अरुण शर्मा साहिबाबादी

नाम-अरुण कुमार शर्मा क़लमी नाम-अरुण शर्मा साहिबाबादी पिता -जगदीश दत्त शर्मा शिक्षा-एम ए उर्दू ,मुअल्लिम उर्दू ,बीटीसी उर्दू। जीविका उपार्जन- सरकारी शिक्षक पता-एफ़ 73, पहली मंज़िल,पटेल नगर-3, ग़ाज़ियाबाद। मोबाइल-9311281968 पुस्तकें-खोली, झुग्गी,पुल के नीचे एक पत्ती अभी हरी सी है, मुनफ़रिद,इजतिहाद.मुफ़ीक़ ( सभी कविता संग्रह) पुरुस्कार-उर्दूकी कई संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत। कई सम्मान समारोह आयोजित हुए हैं।