गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

मकीनों को लगते हैं ये ही सुहाने,
कई घर नगर में हैं अब भी पुराने।

जिसे गुम किये भी हुए हैं ज़माने,
कभी दिल निकलता है उसको भी पाने।

ज़मीं चाहे बंजर कि छोटी हो बेशक,
मगर कोई लगता है सपने उगाने।

जो टूटे हुए चंद सामां हैं मुझ पर,
इन्हीं से लगा हूं मैं फिर कुछ बनाने।

जो मेरी नहीं सिर्फ़ मिलती है मुझसे,
वो तस्वीर रक्खी है मेरे सराने।

कि ये तुख़्म अब इक शजर बन चुका है,
नऐ तुख़्म भी ये लगा है उगाने।

ये तुझसे मुकम्मल नहीं मिट सकेगी,
जो तख़लीक़ अपनी चला है मिटाने।

इन्हीं के मुहाफ़िज़ को हम खोजते हैं,
कि होते हैं हम पर भी इक दो ख़ज़ाने।

मेरे अपनों की मुस्कुराहट न कम हो,
मुझे अपने ग़म यूं पड़े हैं छुपाने।

इसी में ही इक रोज़ आएगा मेहमां,
हम अपने खंडर को लगे हैं सजाने।

बहाने से यूं आंसुओं को बहाया,
कि हम बारिशों में चले हैं नहाने।

— अरुण शर्मा साहिबाबादी

अरुण शर्मा साहिबाबादी

नाम-अरुण कुमार शर्मा क़लमी नाम-अरुण शर्मा साहिबाबादी पिता -जगदीश दत्त शर्मा शिक्षा-एम ए उर्दू ,मुअल्लिम उर्दू ,बीटीसी उर्दू। जीविका उपार्जन- सरकारी शिक्षक पता-एफ़ 73, पहली मंज़िल,पटेल नगर-3, ग़ाज़ियाबाद। मोबाइल-9311281968 पुस्तकें-खोली, झुग्गी,पुल के नीचे एक पत्ती अभी हरी सी है, मुनफ़रिद,इजतिहाद.मुफ़ीक़ ( सभी कविता संग्रह) पुरुस्कार-उर्दूकी कई संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत। कई सम्मान समारोह आयोजित हुए हैं।