ग़ज़ल
मकीनों को लगते हैं ये ही सुहाने,
कई घर नगर में हैं अब भी पुराने।
जिसे गुम किये भी हुए हैं ज़माने,
कभी दिल निकलता है उसको भी पाने।
ज़मीं चाहे बंजर कि छोटी हो बेशक,
मगर कोई लगता है सपने उगाने।
जो टूटे हुए चंद सामां हैं मुझ पर,
इन्हीं से लगा हूं मैं फिर कुछ बनाने।
जो मेरी नहीं सिर्फ़ मिलती है मुझसे,
वो तस्वीर रक्खी है मेरे सराने।
कि ये तुख़्म अब इक शजर बन चुका है,
नऐ तुख़्म भी ये लगा है उगाने।
ये तुझसे मुकम्मल नहीं मिट सकेगी,
जो तख़लीक़ अपनी चला है मिटाने।
इन्हीं के मुहाफ़िज़ को हम खोजते हैं,
कि होते हैं हम पर भी इक दो ख़ज़ाने।
मेरे अपनों की मुस्कुराहट न कम हो,
मुझे अपने ग़म यूं पड़े हैं छुपाने।
इसी में ही इक रोज़ आएगा मेहमां,
हम अपने खंडर को लगे हैं सजाने।
बहाने से यूं आंसुओं को बहाया,
कि हम बारिशों में चले हैं नहाने।
— अरुण शर्मा साहिबाबादी
