वह लड़का
वह कोई अमीर घर का बेटा नहीं था। न ही उसके पास बड़ी-बड़ी ख्वाहिशें थीं। बस कुछ छोटे-छोटे सपने थे- अपने मन की पढ़ाई करना, अपने पसंद का काम करना, अपने माँ-बाप को एक अच्छा घर देना और एक दिन बिना किसी डर के मुस्कुराना।
लेकिन उसे नहीं पता था कि सपनों से पहले उसका सामना समाज से होगा। समाज,
जो हर गली में बैठा था, हर चौपाल पर मौजूद था, हर रिश्तेदार की ज़ुबान पर था, और सबसे ज़्यादा उसके अपने घर के भीतर था।
जब उसने अपने मन की बात कही, तो जवाब मिला— “इतनी आज़ादी अच्छी नहीं होती।” जब उसने अपने सपनों की बात की, तो कहा गया— “लोग क्या कहेंगे?” जब उसने अपने लिए जीना चाहा, तो उसे समझाया गया— “परिवार की इज़्ज़त सबसे पहले आती है।”
उसने बहस नहीं की, क्योंकि उसे अपने माँ-बाप से मोहब्बत थी। उसे डर था कहीं उसकी वजह से उनके सिर झुक न जाएँ। और उसी दिन उसने अपने सपनों का गला अपने ही हाथों से घोंट दिया।
धीरे-धीरे वह बदलने लगा। पहले उसकी हँसी कम हुई, फिर उसकी बातें और फिर उसकी आँखों की चमक भी। लोग कहते— “पहले जैसा नहीं रहा।” किसी ने यह नहीं पूछा— “उसे पहले जैसा रहने ही किसने दिया?”
हर रात वह अपने कमरे में बैठकर सोचता— “अगर मैं अपने सपने चुनूँ, तो लोग मेरे माँ-बाप को गलत कहेंगे।” “अगर मैं समाज को चुनूँ, तो मैं पूरी ज़िंदगी खुद से नज़रें नहीं मिला पाऊँगा।”
उसने समाज को चुन लिया। क्योंकि उसे अपने टूटने से ज़्यादा अपने परिवार के टूटने का डर था। वह हर दिन मुस्कुराता रहा हर रिश्ता निभाता रहा हर उम्मीद पूरी करता रहा लेकिन उसके भीतर का लड़का हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा मरता रहा।
सालों बाद लोग कहते थे— “देखो कितना समझदार लड़का है, कभी किसी के खिलाफ़ नहीं गया।” पर किसी को यह नहीं पता था कि वह समझदार नहीं, मजबूर था।
उसने किसी से शिकायत नहीं की। बस एक दिन आईने में खुद को देखकर इतना कहा— “मैं हार अपनी किस्मत से नहीं हारा मैं उस समाज से हार गया, जिसने मुझे अपने सपनों के साथ जीने ही नहीं दिया। और आईना उस दिन पहली बार उसे देखकर रो पड़ा।
— धर्मेन्द्र शर्मा
