गजल
जब भी बेतुके सवाल उठाते हैं
वे समाधान कहां ढूंढ़ पाते हैं
भरे लिफाफे जो भी देता उनको
उसको वे कानून से बचाते हैं
सुनाई देता हैं नहीं उसे जन्म जात
पास जाकर खूब शोर मचाते हैं
रास आई नहीं उनकी दोस्ती तो
उनके बीच बहुत आग लगाते हैं
सीधा-सादा जो रहता हरदम
आप सब मिलकर उसे सताते हैं
किया नहीं जिसने ज़रा सा भी काम
फिर भी उसे ही जिताकर लाते हैं
दो नम्बर का जितना कमाया मित्रों
उसको ही दान पुण्य में खपाते हैं
करते है दिन रात वे काला काम
फिर भी देखिये उजले कहलाते हैं
शकुनी होता कर देते उसे मात
जीत की ऐसी गोटी बिछाते हैं
सुखी वही रहता है आजकल यहां
जो गलत तरीके से कमाते हैं
— रमेश मनोहरा
