ग़ज़ल
टूटे हुए सपनों को फिर से सजाना है।
दुनिया में तुझे ऊंचा रुतबा बनाना है।।
जुगनू की तरह बनकर रहना नहीं यहां।
दिनकर की तरह तुझको बनकर दिखाना है।।
जीवन में कभी काला अंधियार जब घिरे।
तुझको बुझे दीपक को फिर से जलाना है।।
कोना कोई धरती का बंजर न रहे अब।
बीजों को बचा के तुझे जंगल उगाना है।।
बच्चा न किसी घर में रोता हुआ मिले।
रोते हुए बच्चों को तुझको हंसाना है।।
गलियों में फैले न कहीं नफरत की आग अब।
हर दिल से नफरतों को तुझको मिटाना है।।
नारी का न करे कोई अपमान अब यहां।
गंदी नजर से बेटी को हर पल बचाना है।।
हर घर बने खुशहाल और हंसते रहे सभी।
आंसू सभी के पोंछ के खुशियों को लाना है।।
— शालिनी शर्मा
