सामाजिक

शिक़वे-ग़िले और जुदाई का दर्द

लोग अक्सर यह समझते हैं कि इश्क़ सिर्फ़ वादों की छांव में, क़समें खाने में और साथ उम्र बिताने के लंबे सफ़र में ही ज़िंदा रहता है। पर जो लोग इश्क़ की आग में पूरी तरह जल चुके हैं, वे जानते हैं कि मोहब्बत की असली धड़कन तो उन अनकहे शिक़वों और हक़ भरी शिकायतों में बसती है, जो आशिक़ अपनी माशूका से सिर्फ़ इसलिए करता है क्योंकि वह उसे अपनी दुनिया मानता है। जब एक आशिक़ अपनी माशूका से रूठता है, तो उसके हर एक शिक़वे के पीछे एक ही दुआ होती है,कि वह उसे मना ले। क्योंकि जिस रिश्ते में शिकायतें ज़िंदा रहती हैं, समझो वहां रूहें अब भी एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं।
लेकिन, क़यामत तो तब आती है जब शिकायतों का सिलसिला थम जाता है, जब दिल के सारे ग़िले-शिक़वे दम तोड़ देते हैं। उस ख़ामोशी से भयानक मौत किसी रिश्ते की नहीं हो सकती। जिस दिन माशूक़ ख़ामोश हो जाए और आशिक़ के किसी भी शिक़वे का जवाब न दे, समझ लेना चाहिए कि अब मोहब्बत की क़ब्र पर ख़ामोशी की पहली मिट्टी डाली जा चुकी है। वह ख़ामोशी दिलों के बीच हमेशा के लिए दीवार बन जाती है।
और फ़िर ज़िंदगी के इस सफ़र में कुछ पल ऐसे आते हैं, जो तमाम उम्र का मरहम या नासूर बन जाते हैं। यूं तो लोग पहली मुलाक़ात को पूरी ज़िंदगी याद रखते हैं, जब नज़रें पहली बार मिली थीं, नाम ज़ेहन में उतरे थे और एक-दूसरे के लहज़े को परखने की कोशिश हो रही थी। लेकिन आशिक़ और माशूक़ की ‘आखिरी मुलाक़ात’ का दर्द कुछ और ही होता है। उस आख़िरी मुलाकात से ज़्यादा गहरा और दर्दनाक कुछ नहीं होता।
शायद उस वक्त दोनों के दिलों को पहले से ही इस बात की ख़बर होती है कि यह हसीन मंज़र, यह आमने-सामने बैठकर एक-दूसरे को जी भर के देखना अब इस जन्म में दोबारा नसीब नहीं होगा। तभी तो विदाई के उन चंद लम्हों को, माशूक़ के मुड़कर आखिरी बार देखने को, जाते-जाते उस भीगे हुए हाथ हिलाने को, और किसी पुरानी बात पर बेवजह मुस्कुरा देने वाले पलों को आशिक अपने सीने में हमेशा के लिए दफ़ना लेता है।
और सबसे ज़्यादा टीस तो वो मामूली सी ख़ामोशी देती है, जिसे उस वक्त दोनों ने महज़ एक इत्तेफ़ाक़ या मामूली बात समझकर छोड़ दिया था, पर वही ख़ामोशी आगे चलकर पूरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा दर्द बन जाती है। माशूक़ की जुदाई का यह ग़म एक ऐसे मर्ज़ की तरह है, जिसकी दवा सिर्फ़ वही ख़ामोश लम्हे हैं, जो अब कभी लौटकर नहीं आएंगे।

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।