स्वास्थ्य

वायु प्रदूषण शरीर को कहाँ-कहाँ छूता है?

हम दिनभर में न जाने कितनी बार साँस लेते हैं। साँस लेना इतना सहज और स्वाभाविक है कि हम शायद ही कभी सोचते हैं कि हर साँस के साथ हमारे शरीर में क्या प्रवेश कर रहा है। हवा साफ हो तो यही साँस जीवन को ऊर्जा देती है, लेकिन हवा में धूल, धुआँ, सूक्ष्म कण और हानिकारक गैसें मिली हों तो वही साँस धीरे-धीरे हमारे स्वास्थ्य पर असर डाल सकती है। हम अक्सर सिरदर्द, आँखों में जलन, गले में खराश या दिनभर थकान महसूस होने पर दवा ले लेते हैं, लेकिन यह नहीं सोचते कि कहीं हमारे आसपास का वातावरण भी इसका कारण तो नहीं। स्वास्थ्य की सही समझ के लिए केवल शरीर की जाँच करना ही पर्याप्त नहीं; यह जानना भी जरूरी है कि व्यक्ति दिनभर कहाँ रहता है, कहाँ काम करता है और किस तरह की हवा में साँस लेता है।

वायु प्रदूषण का सबसे सीधा प्रभाव हमारे श्वसन तंत्र पर पड़ता है। धूल और धुएँ से नाक, गले तथा श्वसन मार्ग में जलन, खाँसी, खराश और साँस लेने में परेशानी हो सकती है। लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहने से फेफड़ों की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है और अस्थमा जैसी समस्याएँ बढ़ सकती हैं। विशेष चिंता PM2.5 जैसे सूक्ष्म कणों की होती है, जो फेफड़ों की गहराई तक पहुँच सकते हैं और वहाँ सूजन तथा ऑक्सीडेटिव तनाव जैसी प्रक्रियाएँ बढ़ा सकते हैं। लेकिन प्रदूषण की कहानी फेफड़ों पर समाप्त नहीं होती। लंबे समय तक प्रदूषित हवा के संपर्क को हृदय और रक्तवाहिकाओं से जुड़े रोगों, हृदयाघात तथा स्ट्रोक के बढ़े हुए जोखिम से भी जोड़ा गया है। इसका अर्थ है कि प्रदूषण का असर उन अंगों पर भी हो सकता है जिन्हें हम सामान्यतः साँस की समस्या से जोड़कर नहीं देखते।

आँखें और त्वचा भी प्रदूषित वातावरण के प्रभाव से अछूती नहीं रहतीं। धूल, धुआँ और कुछ गैसीय प्रदूषक आँखों में जलन, लालिमा, खुजली, पानी आने और सूखेपन जैसी समस्याएँ पैदा कर सकते हैं। कई बार व्यक्ति इसे सामान्य थकान समझकर अनदेखा कर देता है, जबकि किसी विशेष जगह पर जाने से परेशानी बढ़ना और वहाँ से हटने पर राहत मिलना वातावरण की ओर ध्यान देने का संकेत हो सकता है। इसी तरह हमारी त्वचा पूरे दिन बाहरी वातावरण के संपर्क में रहती है। वायु प्रदूषक त्वचा की प्राकृतिक सुरक्षा-परत को प्रभावित कर सकते हैं और ऑक्सीडेटिव तनाव बढ़ा सकते हैं, जिससे रूखापन, जलन, संवेदनशीलता तथा समय से पहले त्वचा की उम्र बढ़ने जैसी समस्याएँ हो सकती हैं। इस प्रकार प्रदूषण केवल वह नहीं है जिसे हम साँस के साथ अंदर लेते हैं; हमारी त्वचा और आँखें भी लगातार उसका सामना करती हैं।

वायु प्रदूषण का संबंध मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र के स्वास्थ्य से भी देखा जा रहा है। विभिन्न अध्ययनों में प्रदूषण और ध्यान, स्मृति, नींद तथा मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े प्रभावों के बीच संबंध पाए गए हैं। प्रदूषण से जुड़ी सूजन और ऑक्सीडेटिव तनाव शरीर की तंत्रिका प्रणाली को प्रभावित कर सकते हैं। बच्चों के मामले में यह विषय विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि उनका शरीर और मस्तिष्क अभी विकास की अवस्था में होता है। इसलिए स्वच्छ हवा की आवश्यकता केवल उन लोगों के लिए नहीं है जिन्हें पहले से कोई बीमारी है, बल्कि बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और स्वस्थ व्यक्तियों सहित सभी के लिए है।

वायु प्रदूषण केवल सड़क के धुएँ या शहर की धुंध की समस्या नहीं है; हमारे कार्यस्थल की हवा भी स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है। इसका एक वास्तविक उदाहरण पुदुचेरी की चयनित साबुन फैक्ट्रियों में वर्ष 2018 में 305 श्रमिकों पर किया गया अध्ययन है। इसमें श्रमिकों के बीच श्वसन संबंधी समस्याएँ, साँस फूलना और त्वचा संबंधी शिकायतें दर्ज की गईं। कुछ श्रमिकों की फेफड़ों की कार्यक्षमता की जाँच में भी असामान्य परिणाम पाए गए। डिटर्जेंट बनाने वाले श्रमिकों पर हुए एक अन्य अध्ययन में काम के दौरान डिटर्जेंट एंजाइमों के संपर्क में रहने वाले अधिक जोखिम वाले समूह में नाक में खुजली, छींक और साँस संबंधी समस्याएँ अधिक देखी गईं। ये अध्ययन हमें बताते हैं कि जिस जगह से हमारी रोजी-रोटी चलती है, वहाँ का वातावरण भी हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। इसलिए डॉक्टर के लिए केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं कि “कहाँ दर्द है?” यह पूछना भी उपयोगी हो सकता है कि “आप दिनभर कहाँ काम करते हैं? वहाँ धूल, धुआँ, रसायन या तेज गंध तो नहीं रहती?” इससे बीमारी और व्यक्ति के वातावरण के बीच संभावित संबंध को समझने में मदद मिल सकती है।

वायु प्रदूषण का एक और गंभीर पहलू कैंसर से उसका संबंध है। अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक संस्थाओं ने बाहरी वायु प्रदूषण और उसमें मौजूद पार्टिकुलेट मैटर को मानवों में कैंसरकारी माना है। लंबे समय तक प्रदूषित हवा के संपर्क को विशेष रूप से फेफड़ों के कैंसर के बढ़े हुए जोखिम से जोड़ा गया है। इसका अर्थ यह नहीं कि प्रदूषित हवा में साँस लेने वाला हर व्यक्ति कैंसर का शिकार होगा, क्योंकि कैंसर अनेक कारणों से जुड़ी जटिल बीमारी है। फिर भी वायु प्रदूषण को केवल अस्थायी असुविधा समझकर नजरअंदाज करना उचित नहीं है। प्रदूषण के स्रोतों को कम करना, घर और कार्यस्थल में उचित वेंटिलेशन रखना, धुआँ तथा धूल कम करना और जरूरत के अनुसार उपयुक्त सुरक्षा उपाय अपनाना स्वास्थ्य जोखिम घटाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

समस्या को समय रहते समझने के लिए हम WCM का प्रयोग कर सकते हैं। इसका अर्थ है—देखें, पहचानें और मिलान करें। देखें कि हमारे घर, कार्यस्थल और आसपास की हवा कैसी है; पहचानें कि धूल, धुआँ, रसायन, फफूँद या वाहन जैसे प्रदूषण स्रोत कहाँ से आ रहे हैं; और मिलान करें कि खाँसी, आँखों की जलन, सिरदर्द, थकान या साँस की परेशानी किसी विशेष जगह या परिस्थिति से जुड़ी दिखाई देती है या नहीं। यह अभ्यास बीमारी का स्वयं निदान करने का विकल्प नहीं है, लेकिन वातावरण पर ध्यान देने और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर को सही जानकारी देने में मदद कर सकता है। स्वच्छ हवा केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि हमारे फेफड़ों, हृदय, आँखों, त्वचा, मस्तिष्क और पूरे शरीर के स्वास्थ्य से जुड़ी है। अगली बार जब हम साँस लें, तो एक पल रुककर सोचें—हम केवल साँस नहीं ले रहे हैं, बल्कि अपने आसपास के वातावरण को अपने शरीर के भीतर प्रवेश दे रहे हैं। इसलिए हवा को स्वच्छ रखना केवल प्रकृति की रक्षा नहीं, अपने शरीर की रक्षा भी है।

— बी. के. शिव अरोड़ा

बी. के. शिव अरोड़ा

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