यादों की महफिल
विधा- कविता
शीर्षक- यादों की महफिल
वो सिमटी महकती-सी कुछ यादें,
महका देतीं हैं तन-मन-जीवन,
अक्सर पहुंचा देती हैं उन वीथियों में,
जहाँ बीता था प्यारा-सा बचपन।
कभी पहुंचा देती हैं उन गलियों में,
गुजरा जहाँ सलोना-सा किशोरपन,
वो प्यारी-सी सखियां-सहेलियां,
साथ जिनके हर्षित होता था मन।
कभी पहुंचा देती हैं उन स्मृतियों में,
संग मिला जब सपनों के सजना का,
गूंजी थी किलकारियां नवांकुरों की,
रुनझुन से हुआ गुंजित अंगना था।
यादों की महफिल में कभी जज़्बात उभर आते हैं,
तन्हाई में हृदय के ज़ख्म नज़र आते हैं,
इन ज़ख्मों, जज़्बातों को लफ्जों में पिरोया,
तब कभी कविता कभी ग़ज़ल बन जाते हैं!
सिमटी महकती-सी मधुर यादें ही,
होती है जीवन का अनमोल धन,
यादें होती हैं कुछ कड़वी-कसैली भी,
दे जाती हैं वे भी सबक, संवरता जीवन।
स्वरचित और मौलिक
लीला तिवानी
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया
