कहानी – रेत का महल
जून की तपती दोपहर हो या जुलाई की उमस भरी शाम, सुनील का पूरा दिन सीढ़ी पर ही बीतता था। कभी किसी चौथी मंज़िल की खिड़की के बाहर लटककर, कभी किसी तंग छत पर झुककर, वह पुराने यंत्र खोलता, उनके भीतर जमी धूल झाड़ता, उलझे तार जोड़ता और ठंडक का द्रव भरता। शाम होते होते हाथ काले पड़ जाते, कमीज़ पसीने से चिपक जाती और कमर में ऐसी ऐंठन उठती कि सीधा खड़ा होना भी कठिन लगता। पर घर की चौखट पर पहुँचते ही जब काजल मुस्कुराकर दरवाज़ा खोलती, तो उसे लगता कि दिन भर की सारी थकान किसी ने हाथ बढ़ाकर उतार ली है।
काजल सचमुच बहुत सुंदर थी। गोरा रंग, लंबे घने बाल और आँखों में ऐसी चमक कि मोहल्ले की औरतें भी एक बार मुड़कर उसे देख लेती थीं। उसे सजना सँवरना अच्छा लगता था। उसे महंगी जगहों पर घूमना पसंद था और अपनी तस्वीरें सबको दिखाना भी। सुनील यह सब जानता था और इसीलिए अपनी हैसियत से कहीं ऊपर जाकर उसकी हर इच्छा पूरी करने में लगा रहता था।
नया मोबाइल आया तो उसके लिए, जिसका दाम सुनील की आधी तनख़्वाह के बराबर था। नामी दुकानों के कपड़े आए, जिनके लिए उसने अपने साथियों से उधार लिया। जन्मदिन पर शहर के सबसे चमकदार भोजनालय में रात्रिभोज रखा गया, जहाँ एक थाली का दाम सुनील की पूरे दिन की कमाई से अधिक था। उस रात वह बार बार देयक को देखता रहा और हर बार मन ही मन हिसाब लगाकर चुप हो जाता। पर काजल की आँखों में खुशी देखकर वह स्वयं से कहता, कोई बात नहीं, महीने के अंत में दो चार काम और पकड़ लूँगा।
उसने कभी जताया नहीं कि वह थक रहा है। रात को जब काजल सोने से पहले अपने मोबाइल में दूसरों की चमकती तस्वीरें देखती, तो सुनील चुपचाप पास बैठकर अपने पैरों की सूजन पर सरसों का तेल मलता रहता। काजल कभी कभी पूछ लेती, तुम इतना क्यों खटते हो। सुनील हँसकर कहता, तेरे लिए। काजल मुस्कुरा देती, पर उस मुस्कान में अब पहले जैसी गर्माहट नहीं बची थी।
दरअसल काजल के भीतर कुछ बदलने लगा था। जिन चीज़ों को पाकर वह पहले खिल उठती थी, वे अब उसे छोटी लगने लगी थीं। जिस सहेली के पति ने उसे विदेश की यात्रा करवाई थी, उसकी तस्वीरें देखकर काजल के मन में कड़वाहट उठती। वह सोचती, क्या मेरा रूप इसी छोटे से किराए के घर में गल जाने के लिए है। सुनील की कमाई से उसके शौक कभी पूरे नहीं होंगे, यह विचार धीरे धीरे उसके भीतर जड़ पकड़ता गया। वह सुनील से कम बोलने लगी। उसके काले हाथों से उसे घिन आने लगी और उसके पसीने की गंध से वह मुँह फेर लेने लगी।
सुनील यह सब देखता था, पर समझ नहीं पाता था। वह सोचता कि शायद उसी की कमी है, शायद उसे और मेहनत करनी चाहिए। इसलिए उसने सुबह जल्दी निकलना और रात को देर से लौटना शुरू कर दिया। छुट्टी के दिन भी वह किसी पड़ोसी का पुराना यंत्र सुधारने बैठ जाता, ताकि चार पैसे और जुड़ सकें। उसे नहीं पता था कि जिस घर के लिए वह अपनी देह गला रहा है, उस घर से उसकी पत्नी का मन कब का उठ चुका है।
एक शाम उसने काजल के लिए बाज़ार से गरम जलेबियाँ बँधवाईं, जो उसे बचपन से प्रिय थीं। घर पहुँचा तो काजल सजी हुई बाहर जाने को तैयार खड़ी थी। सुनील ने दोना आगे बढ़ाया तो उसने बिना देखे कहा, अभी मन नहीं है, देर हो रही है। दरवाज़ा बंद हुआ और जलेबियाँ मेज़ पर पड़े पड़े ठंडी हो गईं। सुनील ने उन्हें अकेले बैठकर खाया। मिठास फीकी लगी, पर उसने स्वयं से यही कहा कि आज उसे कोई आवश्यक काम होगा।
इन्हीं दिनों काजल की जान पहचान अमन से हुई। अमन शहर के एक बड़े व्यापारी का इकलौता बेटा था। लंबी गाड़ी, ऊँची इमारत में बड़ा घर और जेब में हमेशा बेहिसाब रुपये। एक मित्र के समारोह में दोनों मिले। अमन ने काजल को देखा तो देखता ही रह गया। बातचीत बढ़ी, फिर मुलाकातें होने लगीं।
काजल ने अमन से एक झूठ कहा, जो उसने बड़ी सहजता से गढ़ लिया था। उसने कहा कि वह अकेली रहती है, माता पिता नहीं रहे और अपने बलबूते पर जीवन चला रही है। उसने माँग में सिंदूर भरना छोड़ दिया था और हाथ की अंगूठी उतारकर कपड़ों के बीच छिपा दी थी। दिन भर वह सुनील के जाने की प्रतीक्षा करती और फिर सज धजकर अमन से मिलने निकल जाती।
अमन ने उसे वही जीवन दिया जिसका स्वप्न काजल बरसों से देखती आई थी। शहर के सबसे महंगे भोजनालयों में रात्रिभोज, बड़े बाज़ारों में खरीदारी, हीरे जड़े गहने और विदेश घुमाने के वादे। अमन कहता, देखना काजल, अगले बरस हम पेरिस चलेंगे। काजल की आँखें चमक उठतीं। उसे लगता कि उसकी असली दुनिया अब शुरू हुई है और पिछला सब कुछ किसी बुरे स्वप्न जैसा था।
कभी कभी बड़ी गाड़ी की पिछली पंक्ति में बैठे हुए काजल के मन में एक पल को सुनील का चेहरा कौंध जाता था। उसे अपराध का भाव घेरता, पर वह उसे तुरंत झटक देती। वह स्वयं को समझाती कि हर किसी को अच्छा जीवन जीने का अधिकार है और उसने कोई पाप नहीं किया। एक झूठ को बचाने के लिए सौ झूठ और बोलने पड़ते हैं, यह बात उसे तब समझ नहीं आई थी।
घर लौटकर वह सुनील के सामने थकी हुई बनकर बैठ जाती। कहती कि सहेली के यहाँ गई थी, देर हो गई। सुनील थाली परोसकर उसके सामने रख देता। वह कुछ नहीं पूछता था। उसे पूरा विश्वास था कि उसकी पत्नी उससे छल नहीं कर सकती। पर कभी कभी रात के सन्नाटे में उसे बेचैनी होती। काजल के कपड़ों से आती अनजानी सुगंध, उसकी कलाई पर अचानक आ गई नई घड़ी, ये छोटी छोटी बातें उसके मन में काँटे की तरह चुभतीं। पर वह स्वयं को समझा लेता कि मेरा ही मन छोटा होता जा रहा है।
कुछ महीने यूँ ही बीत गए। फिर एक दिन भाग्य ने अपना खेल खेला। अमन के घर का वातानुकूलक बिगड़ गया। गर्मी इतनी थी कि पूरा घर भट्टी बन चुका था। उसने उसी संस्था को दूरभाष किया जहाँ सुनील काम करता था। संस्था ने उस दोपहर जिस कारीगर को भेजा, वह सुनील ही था। पता थमाया गया तो उसने बस इतना देखा कि शहर के सबसे ऊँचे भवन की आठवीं मंज़िल है। उसने औज़ारों का थैला कंधे पर लटकाया और चल पड़ा।
आठवीं मंज़िल पर पहुँचकर उसने घंटी बजाई। भीतर से पैरों की आहट आई, दरवाज़ा खुला और सामने काजल खड़ी थी। अमन के घर में, अमन की दी हुई रेशमी पोशाक पहने, गले में नया हार डाले। एक क्षण के लिए दोनों के बीच समय थम गया। काजल के चेहरे का रंग उड़ गया। सुनील की आँखें उस पर टिकी रहीं, पर उसके होंठ नहीं हिले।
तभी भीतर से अमन की आवाज़ आई, “कौन है काजल, कारीगर आ गया क्या?” वह बैठक में आया और सुनील को देखकर बोला, “आओ भाई, यंत्र इसी कमरे में बंद पड़ा है, ज़रा देख लो।” अब तीनों एक ही कमरे में थे। अमन को कुछ पता नहीं था। काजल की साँसें अटकी हुई थीं और सुनील के भीतर तूफ़ान उठ रहा था। पर उसने तुरंत कुछ नहीं कहा।
वह चुपचाप सीढ़ी लगाकर यंत्र खोलने लगा। हाथ वही थे, काम वही था, पर आज हर पेंच कसते हुए उसे लग रहा था मानो वह अपने ही मन के पेंच कस रहा हो। काजल कोने में खड़ी काँप रही थी। अमन कुर्सी पर बैठा अपने मोबाइल में कुछ देख रहा था। कमरे में केवल औज़ारों की खट खट गूँजती रही।
कुछ देर बाद सुनील ने नीचे उतरकर हाथ पोंछे और बड़ी शांत आवाज़ में अमन से पूछा, “साहब, एक सवाल पूछूँ?” अमन ने मुस्कुराकर सिर हिलाया। सुनील बोला, “साहब, अगर आपको पता चले कि जिससे आप प्यार करते हैं, वह आपसे केवल पैसों के लिए प्यार कर रही है, तो आप क्या करेंगे?”
अमन हँस पड़ा। उसने काजल की ओर प्यार भरी नज़र से देखा और कहा, “यह भी कोई पूछने की बात है? मैं ऐसी लड़की को उसी क्षण छोड़ दूँगा। मुझे धोखेबाज़ लड़की नहीं चाहिए। मैं सब सह सकता हूँ, छल नहीं।” काजल का गला सूख गया। उसने सुनील की ओर देखा, पर सुनील की आँखों में क्रोध नहीं था। वहाँ केवल एक गहरी, ठहरी हुई उदासी थी।
सुनील ने धीरे से सिर हिलाया और कहा, “तो फिर देख लीजिए साहब, यह मेरी पत्नी काजल है। पिछले 3 बरस से मेरा ब्याह हुआ है इससे।”
अमन के चेहरे का रंग सफ़ेद पड़ गया। कुछ पल तक वह मानो सुन ही नहीं सका कि क्या कहा गया है। फिर उसने काजल की ओर देखा। उसकी आँखों में अब प्यार नहीं था, केवल अविश्वास था।
काजल फूट फूटकर रोने लगी। वह भागकर अमन के पास आई और उसके हाथ थामने लगी। “अमन, मेरी बात सुनो, मैं मजबूर थी, मुझे अच्छा जीवन चाहिए था, मैं बस एक अच्छे जीवन के लिए तरस गई थी…”
अमन ने झटके से हाथ छुड़ा लिया और उसकी बात बीच में ही काट दी। बोला, “मुझे गरीब लड़की से कोई कठिनाई नहीं थी काजल। मैं तुम्हें तब भी अपनाता। मुझे कठिनाई झूठ से है। आज तुमने अपने पति को धोखा दिया और मुझसे सच छिपाया। कल कोई और अमीर मिल जाएगा तो मुझे भी छोड़ दोगी। यह प्यार नहीं है, तुम पैसों से प्यार करती हो।”
काजल के पास कोई उत्तर नहीं था। वह वहीं भूमि पर बैठ गई। अमन सुनील की ओर मुड़ा और हाथ जोड़कर बोला, “भाई, मुझे क्षमा करना। मुझे नहीं पता था कि वह किसी की पत्नी है। तुम्हारी ईमानदारी को मेरा सलाम। तुमने सच्चा प्यार किया है।” सुनील ने कुछ नहीं कहा। वह बस हल्के से सिर झुकाकर रह गया।
अंत में काजल दोनों ओर से अकेली रह गई। अमन ने कठोर स्वर में कहा कि वह इसी क्षण उसके घर से चली जाए। उसने काजल की ओर दोबारा नहीं देखा। सुनील ने अपना काम पूरा किया, यंत्र चलाकर जाँचा कि ठंडी हवा आने लगी है, औज़ारों का थैला उठाया और बिना कुछ कहे सीढ़ियों से नीचे उतर गया। उसने पलटकर भी नहीं देखा। न क्रोध था, न कोई ताना। बस एक चुप थकान थी, जो उसके कंधों पर पहले से कहीं भारी हो गई थी।
काजल देर तक वहीं बैठी रही। फिर वह भी बाहर निकली, तन पर केवल वही कपड़े जो उसने पहने थे। सड़क पर आई तो तपती हवा ने उसका चेहरा झुलसा दिया। कहाँ जाए, यह वह तय नहीं कर पा रही थी। पुराने घर का रास्ता याद आया, पर वहाँ किस मुँह से जाए। जिस अंगूठी को उसने छिपाया था, वह अब भी उसकी मुट्ठी में दबी थी। उसने उसे देखा तो उसकी आँखें फिर भर आईं।
उस रात काजल सीढ़ियों पर ही बैठी रही। कई बरस बाद उसे अपने सारे बीते दिन याद आए। सुनील का पसीने से भीगा चेहरा, उधार की थाली, पैरों पर मला जाता सरसों का तेल। जब वह थककर लौटता था, तब भी उसके होंठों पर कोई शिकायत नहीं होती थी। उसे पहली बार समझ आया कि जो उसे छोटा लगता था, वही सबसे बड़ा था।
उस दिन काजल समझ गई कि पैसों से महंगे कपड़े तो आ जाते हैं, गाड़ियाँ और बड़े घर भी आ जाते हैं, पर भरोसा एक बार चला जाए तो फिर लौटकर नहीं आता। जो हाथ उसके लिए दिन रात पसीना बहाते थे, उन्हीं को उसने काला कहकर ठुकराया था। और जिस चमक के पीछे वह भागी, वह एक झूठ के सहारे टिकी थी, जो पहली ही कड़ी परीक्षा में पूरी तरह बिखर गया।
— महेन्द्र तिवारी
