मक्खी मारने हथौड़ा न चलाएँ
मक्खी बैठी हो दीवारों पे, या भिनभिनाए कानों में,
क्या हथौड़ा लेकर दौड़ेंगे, हम अपने ही मकानों में?
रोकना तो राहों को रोकिए, नियमों का सम्मान रहे,
मगर जनता की सुविधा का, थोड़ासा तो ध्यान रहे।
यारों मेट्रो केवल “रेल” नहीं है, लाखों की उम्मीद है,
कहीं दफ्तर जाने का साधन, तो ख़्वाबों की नींव है।
बच्चे स्कूल पहुँचते इससे, मजदूरों की राह हसीन हैं,
बुजुर्गों और बीमारों को, आसान चाह यह नगीन है।
न्यायालय की रहती गरिमा, प्रशासन के अपने काम,
लेकिन जनसुविधा रक्षा हैं, होनी चाहिए सुबह-शाम।
मक्खी मारने को हथौड़ा, क्योंकर हम इस्तेमाल करें?
छोटी-सी असहमति पर क्यों?, बड़े संकट तैयार करें।
बातचीत से हल निकल सकता, “संवादों” से राह बने,
जिद की ऊँची दीवारों पर, यूं समझदारी की धूप तने।
न जनता को कष्ट मिले, न न्याय व्यवस्था झुकने पाए,
लोकतंत्र की मर्यादा, हर अधिकार सुरक्षित रह जाएँ।
— संजय एम तराणेकर
