राजनीति

जनहित ही जनादेश, जनतंत्र जनकल्याण हेतु

भारतीय जनतंत्र को जनता के कल्याण पर केंद्रित करने का सबसे विश्वसनीय आधार स्वयं भारतीय संविधान में मौजूद है। संविधान के अनुच्छेद 38 में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय पर आधारित व्यवस्था स्थापित करने तथा आय, प्रतिष्ठा, सुविधाओं और अवसरों की असमानताओं को कम करने का निर्देश दिया गया है। अनुच्छेद 39 आजीविका, संसाधनों के जनहितकारी वितरण और आर्थिक शक्ति के संकेंद्रण को रोकने जैसे उद्देश्यों पर बल देता है। अनुच्छेद 47 पोषण, जीवन स्तर और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार को राज्य के प्रमुख दायित्वों में रखता है। इन संवैधानिक आदर्शों को शासन के दैनिक निर्णयों, बजट और प्रशासनिक जवाबदेही में उतारना ही जनकल्याणकारी जनतंत्र की दिशा में पहला कदम है।

जनकल्याणकारी जनतंत्र का अर्थ केवल गरीबों को आर्थिक सहायता देना या चुनाव से पहले नई योजनाओं की घोषणा करना नहीं है। इसका वास्तविक उद्देश्य ऐसी व्यवस्था बनाना है, जिसमें प्रत्येक नागरिक को सम्मानजनक जीवन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं, रोजगार, न्याय और विकास के समान अवसर प्राप्त हों। सरकार की सफलता का मूल्यांकन केवल सकल घरेलू उत्पाद, विदेशी निवेश, शेयर बाजार अथवा बड़ी परियोजनाओं से नहीं होना चाहिए। यह भी देखना चाहिए कि आम परिवार की आय कितनी बढ़ी, बच्चों की शिक्षा कितनी बेहतर हुई, इलाज का खर्च कितना कम हुआ और नागरिकों को सरकारी सेवाएं प्राप्त करने में कितनी कठिनाई हुई।

भारत ने गरीबी कम करने और बुनियादी सुविधाओं का विस्तार करने की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है। नीति आयोग के जनवरी 2024 में प्रकाशित चर्चा पत्र के अनुसार, बहुआयामी गरीबी का अनुमानित अनुपात 2013-14 के 29.17 प्रतिशत से घटकर 2022-23 में 11.28 प्रतिशत हुआ। इस अवधि में लगभग 24.82 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर आए। यह अनुमान विभिन्न सर्वेक्षण अवधियों के आंकड़ों और बाद के वर्षों के अनुमानों पर आधारित है, इसलिए इसे प्रत्यक्ष रूप से प्रत्येक वर्ष मापी गई गरीबी का आंकड़ा नहीं समझना चाहिए। यह उपलब्धि महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि गरीबी, बेरोजगारी, कुपोषण और आर्थिक असमानता की समस्याएं समाप्त हो गई हैं। जनतंत्र को उपलब्धियों के साथ शेष चुनौतियों का भी ईमानदार आकलन करना चाहिए।

सबसे पहले, रोजगार को सरकारी नीतियों का केंद्रीय लक्ष्य बनाना होगा। युवाओं को केवल डिग्री देना पर्याप्त नहीं है; उन्हें ऐसे कौशल चाहिए, जिनकी वास्तविक अर्थव्यवस्था में मांग हो। विनिर्माण, कृषि प्रसंस्करण, पर्यटन, स्वास्थ्य सेवाओं, निर्माण, अनुसंधान, डिजिटल कारोबार और हरित ऊर्जा में रोजगार के अवसर बढ़ाए जा सकते हैं। छोटे उद्यमों को सस्ता ऋण, सरल पंजीकरण, समय पर भुगतान और बाजार तक पहुंच उपलब्ध कराना आवश्यक है। सरकारी रोजगार योजनाओं का मूल्यांकन केवल प्रशिक्षित युवाओं की संख्या से नहीं, बल्कि प्रशिक्षण के बाद प्राप्त रोजगार, वेतन, रोजगार की स्थिरता और स्वरोजगार से होने वाली आय के आधार पर किया जाना चाहिए।

दूसरा आवश्यक कदम शिक्षा और स्वास्थ्य को वास्तविक जनसेवा बनाना है। सरकारी विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षक, आधुनिक शिक्षण सामग्री, पुस्तकालय, प्रयोगशालाएं और नियमित शैक्षणिक मूल्यांकन सुनिश्चित किए जाने चाहिए। उच्च शिक्षा को केवल प्रतिष्ठित संस्थानों तक सीमित रखने के बजाय छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों के लिए भी गुणवत्तापूर्ण बनाया जाए। स्वास्थ्य क्षेत्र में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, जिला अस्पतालों, चिकित्सकों, जांच सुविधाओं और आवश्यक दवाओं की उपलब्धता बढ़ाई जाए। बीमारी के कारण परिवारों को कर्ज लेने अथवा संपत्ति बेचने की नौबत नहीं आनी चाहिए। शिक्षा और स्वास्थ्य पर सरकारी व्यय को दीर्घकालीन सामाजिक निवेश समझना होगा, न कि केवल बजट का खर्च।

तीसरा, कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत किए बिना जनकल्याण का लक्ष्य अधूरा रहेगा। किसानों की आय बढ़ाने के लिए सिंचाई, भंडारण, शीतगृह, कृषि अनुसंधान, प्रसंस्करण और बाजार संपर्क को बेहतर बनाना आवश्यक है। किसान उत्पादक संगठनों और सहकारी संस्थाओं को सक्षम बनाकर छोटे किसानों की सौदेबाजी की शक्ति बढ़ाई जा सकती है। फसल विविधीकरण को स्थानीय जलवायु, मिट्टी, बाजार और जल उपलब्धता के अनुरूप प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है; किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य, भुगतान की समयबद्धता और प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा भी चाहिए। ग्रामीण विकास की सफलता तब होगी, जब गांवों में रोजगार और अच्छी सेवाएं उपलब्ध हों तथा लोगों को मजबूरी में पलायन न करना पड़े।

चौथा, सरकारी योजनाओं का लाभ पात्र व्यक्ति तक समय पर पहुंचना चाहिए। डिजिटल भुगतान और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण ने कई योजनाओं में पारदर्शिता बढ़ाने की संभावनाएं पैदा की हैं, लेकिन तकनीक को स्वयं समाधान मान लेना उचित नहीं है। आधार, बैंक खाते, इंटरनेट अथवा दस्तावेजों की त्रुटियों के कारण कोई पात्र नागरिक राशन, पेंशन या अन्य सहायता से वंचित न हो। प्रत्येक योजना में शिकायत निवारण की सरल व्यवस्था, समयबद्ध समाधान और अपील का अधिकार होना चाहिए। जहां डिजिटल प्रक्रिया विफल हो, वहां वैकल्पिक व्यवस्था उपलब्ध कराई जाए। प्रशासन का उद्देश्य नागरिक को अपनी पात्रता सिद्ध करने के लिए बार-बार कार्यालयों के चक्कर लगवाना नहीं, बल्कि उसके अधिकारों को सुलभ बनाना होना चाहिए।

पांचवां, जनप्रतिनिधियों और सरकारी अधिकारियों की जवाबदेही को संस्थागत रूप देना होगा। प्रत्येक प्रमुख योजना के लिए स्पष्ट लक्ष्य, निर्धारित समयसीमा, खर्च का सार्वजनिक विवरण और स्वतंत्र मूल्यांकन होना चाहिए। सामाजिक अंकेक्षण, सूचना का अधिकार, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट तथा संसदीय और विधानसभा समितियों की सिफारिशों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई राजनीतिक पहचान से स्वतंत्र होनी चाहिए। सार्वजनिक खरीद और ठेकों में पारदर्शिता बढ़ाने से सरकारी धन के दुरुपयोग की संभावना कम की जा सकती है। नागरिकों को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि उनके कर से प्राप्त धन कहां खर्च हुआ और उससे वास्तविक लाभ किसे मिला।

छठा, लोकतंत्र को अधिक सहभागी बनाना जरूरी है। ग्राम सभाओं, नगर निकायों और स्थानीय निर्वाचित संस्थाओं को पर्याप्त वित्तीय संसाधन, प्रशासनिक अधिकार और प्रशिक्षित कर्मचारी मिलने चाहिए। स्थानीय समस्याओं का समाधान हमेशा केंद्रीय स्तर पर तैयार नीतियों से नहीं हो सकता। किसी पहाड़ी क्षेत्र की आवश्यकताएं महानगरों से अलग हैं और किसी सूखाग्रस्त जिले की प्राथमिकताएं बाढ़ प्रभावित क्षेत्र से भिन्न हो सकती हैं। स्थानीय योजनाओं के निर्माण में महिलाओं, युवाओं, किसानों, श्रमिकों, दिव्यांगजनों और वंचित समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए। विकास की प्राथमिकताएं जनता के अनुभव और प्रमाणित स्थानीय आवश्यकताओं के आधार पर तय की जानी चाहिए।

सातवां, सामाजिक न्याय को राजनीतिक नारों से आगे ले जाना होगा। जाति, धर्म, लिंग, भाषा, दिव्यांगता और आर्थिक स्थिति के आधार पर अवसरों में मौजूद बाधाओं की पहचान कर उन्हें दूर करना आवश्यक है। महिलाओं की शिक्षा, सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन, रोजगार में समान अवसर और देखभाल संबंधी सुविधाएं आर्थिक भागीदारी बढ़ा सकती हैं। दिव्यांग नागरिकों के लिए सुलभ भवन, परिवहन और डिजिटल सेवाएं सुनिश्चित की जानी चाहिए। कमजोर वर्गों के लिए कल्याणकारी योजनाएं सम्मानजनक और भेदभावरहित तरीके से संचालित हों। जनतंत्र तभी सार्थक होगा, जब अधिकार केवल कागज पर नहीं, बल्कि नागरिकों के दैनिक जीवन में दिखाई देंगे।

आठवां, सरकारी बजट को चुनावी लाभ के बजाय दीर्घकालीन जनहित से जोड़ना होगा। मुफ्त सुविधाओं, सब्सिडी और नकद सहायता की उपयोगिता का मूल्यांकन उनके उद्देश्य, लाभार्थियों और वित्तीय स्थिरता के आधार पर किया जाना चाहिए। संकट में कमजोर परिवारों को सहायता देना आवश्यक है, लेकिन स्थायी कल्याण के लिए उत्पादक रोजगार, गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा में निवेश भी जरूरी है। अनावश्यक खर्च घटाते हुए शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, अनुसंधान और स्थानीय बुनियादी ढांचे को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। प्रत्येक नई योजना के साथ उसके वित्तपोषण, अपेक्षित परिणाम और स्वतंत्र मूल्यांकन की व्यवस्था स्पष्ट होनी चाहिए।

अंततः, भारतीय जनतंत्र को जनता के कल्याण पर केंद्रित करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ प्रशासनिक सुधार, पारदर्शिता और नागरिक भागीदारी आवश्यक हैं। सरकार की उपलब्धियों का वास्तविक प्रमाण विज्ञापन, भाषण अथवा घोषणाओं की संख्या नहीं, बल्कि लोगों के जीवन में आया सकारात्मक परिवर्तन होना चाहिए। लोकतंत्र का अर्थ केवल प्रत्येक निश्चित अवधि पर मताधिकार का प्रयोग करना नहीं है; इसका अर्थ सरकार को निरंतर जवाबदेह बनाना भी है। जिस व्यवस्था में नागरिक सम्मान के साथ जीवन जी सकें, अवसरों तक उनकी पहुंच हो और उनकी शिकायतों को गंभीरता से सुना जाए, वही जनकल्याणकारी जनतंत्र कहलाने की अधिकारी है। भारत को इसी दिशा में आगे बढ़ना चाहिए, जहां सत्ता का प्रत्येक निर्णय नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाने की कसौटी पर परखा जाए और विकास का अंतिम लाभ समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति तक पहुंचे।

— डॉ. शैलेश शुक्ला

डॉ. शैलेश शुक्ला

राजभाषा अधिकारी एनएमडीसी [भारत सरकार का एक उपक्रम] प्रशासनिक कार्यालय, डीआईओएम, दोणीमलै टाउनशिप जिला बेल्लारी - 583118 मो.-8759411563

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