हर मन में अब रावण
हर मन में अब रावण रहता।
बाहर राम-राम बस कहता।।
देखा नहीं कभी निज भीतर।
उड़ा रहा औरों को तीतर।।
कहें मित्र यमराज हमारे।
देता किसको कौन सहारे।।
रावण भी है जलता रहता।
मूर्ख नहीं जो इतना सहता।।
पाक साफ खुद को बतलाते।
दूजा को सिद्धांत सिखाते।।
जिनका नहीं किसी से नाता।
अपनी झोली भरना आता।।
रावण भी अब है शर्माता।
भले आपको नहीं सुहाता।।
रावण का पुतला है जलता।
पर इनका तो सिक्का चलता।।
भले कहें सबकी लाचारी।
पर ये आज बड़ी बीमारी।।
भले आप हम कुछ भी कहते।
मजबूरी में सब कुछ सहते।।
रावण को रावण मत बोलो।
निज जीवन में विष मत घोलो।।
सच से दूर सदा ही रहना।
गलती से भी कुछ मत कहना।।
