कहानी

आंसुओं के मोती

(“औलाद दरख़्त की तरह होती है… माँ-बाप उसे अपने खून-ए-जिगर से सींचते हैं, उसे जवान करते हैं, उस पर फ़ूल खिलने की उम्मीद लगाते हैं। लेकिन जब वही दरख़्त साया देने के क़ाबिल होता है, तो अफ़सोस कि कुछ शाखें इतनी ख़ुदग़र्ज़ हो जाती हैं कि जड़ों को ही काटने लगती हैं। याद रखिए, दौलत और शोहरत तो कमाई जा सकती है, मगर माँ-बाप की आह… इंसान को अंदर से खोखला कर देती है।”)
शाम का धुंधका उतर रहा था और लखनऊ की एक पुरानी गली में वाक़े मकान के बरामदे में हाजी इब्राहिम साहब ख़ामोश बैठे तस्बीह फेर रहे थे। उनकी आँखों के सामने माज़ी (बीता हुआ कल) की फ़िल्म किसी परदे की तरह घूम रही थी।
ज़िंदगी भर की कमाई, जो जवानी का पसीना और रातों की नींदें बेच कर जोड़ी गई थी, सब कुछ अपने दोनों बेटो तारिक और जुनैद की तालीम, कारोबार और आलीशान महल नुमा घर की नज़्र कर चुके थे। लेकिन जब बुढ़ापे की धूप तती, तो वही बेटे उनके लिए शजर-ए-सायादार (घना सायेदार दरख़्त) के बजाए जलती हुई रेत साबित हुए।
बहुओं नाज़िया और आयशा की रोज़मर्रा की झकझक और तानों से तंग आ कर दोनों भाइयों ने एक दिन बैठ कर जो फ़ैसला किया, वह किसी ख़ंजर से कम नहीं था। “अब्बा, अम्मी! अब आप दोनों का बोझ हम अकेले नहीं उठा सकते। बेहतर है कि छह माह आप तारिक़ के पास रहें और अगले छह माह जुनैद के पास।
जब इब्राहिम साहब बड़े बेटे तारिक के घर गए, तो उन्हें ड्राइंग रूम के कोने में एक अंधेरे कमरे में जगह मिली, जहाँ पोते-पोतियाँ भी उनसे खुलकर बात करने से डरते थे। और जब अमीना बेगम छोटे बेटे जुनैद के पास गईं, तो उनकी हैसियत एक मेड ,घरेलू नौकरानी से ज़्यादा कुछ न थी।
खाने की प्लेट पर ताने मिलते,”अब्बा, अब आपकी उम्र तक़ाज़ा करती है कि आप घर के मामलात में दख़ल न दें।”
दिल के छाले जब आँसुओं की शक्ल में बहने से क़ासिर रहे, तो इब्राहिम साहब ने अपने अंदर के दर्द को कागज़ पर उंडेलना शुरू किया। उन्होंने एक किताब लिखनी शुरू की, जिसका नाम उन्होंने रखा, “वालिदैन,एक लावारिस साया”। रातों की तन्हाई, सिसकियों और बेबसी की स्याही से लिखी गई वो किताब जब छप कर बाज़ार में आई, तो उसने पूरे मुल्क में तहलका मचा दिया। बुज़ुर्गों के हुक़ूक़ और औलाद की बे-मुरव्वती पर लिखी गई वो किताब देखते ही देखते बेस्टसेलर बन गई और इब्राहिम साहब को उसकी मक़बूलियत और रॉयल्टी की सूरत में बे-पनाह दौलत और शोहरत हासिल हुई।
उधर जब तारिक और जुनैद को मालूम हुआ कि उनके “बोझ बन चुके अब्बा” अब एक मशहूर और मुतमव्विल (धनवान) मुसन्निफ (लेखक) बन चुके हैं, तो उनके ज़मीर तो नहीं जागे, अलबत्ता उनकी नीयतें ज़रूर बदल गईं। दोनों भाई अपनी बीवियों के साथ फूलों का गुलदस्ता लेकर वालिद के पास पहुँचे, यह सोच कर कि अब विरासत और दौलत पर उनका भी हक़ बनता है।
इब्राहिम साहब ने जब अपने बेटों को दहलीज़ पर देखा, तो उनके चेहरे पर एक तल्ख़ सी मुस्कराहट उभरी। उन्होंने अपने दोनों बेटों की तरफ़ देखा, जो नज़रें झुकाए खड़े थे, और धीमी लेकिन भारी आवाज़ में बोले,
“बेटो! जब हमें तुम्हारी मोहब्बत, दो वक़्त की रोटी और एक मुख्लिस पनाह की ज़रूरत थी, तब तुमने हमें अपने घर का बोझ समझ कर बाँट लिया था। आज जब अल्लाह ने हमें इज़्जत, शोहरत और दौलत से नवाज़ दिया है, तो तुम्हें हमारा बाप होना याद आ गया। हमें तुम्हारी ये खोखली मुस्कराहटें और अहसान चाहिए और न ही तुम्हारी दौलत।”
इब्राहिम साहब उठे, अपनी शरीक़-ए-हयात अमीना बेगम का हाथ थामा और अपने उस वफ़ादार गोद लिए हुए बेटे के तरफ़ बढ़ गए, जिसने उनके बुरे वक़्त में ढांढस बंधाई थी। पीछे तारिक़ और जुनैद अपनी दौलत के ढेर पर खड़े शर्मिंदगी के समुद्र में डूब रहे थे।
तारिक़ और जुनैद अपने हाथ में गुलदस्ते लिए, बने बनाए मुजस्समों की तरह वहीं दहलीज़ पर खड़े रह गए। उनकी ज़बानें गुंग हो चुकी थीं और नज़रें शर्म से ज़मीन में गड़ी हुई थीं। वो जो दुनिया को फ़रेब देने के लिए आए थे, आज ख़ुद अपने ही ज़मीर के कटघरे में बेनक़ाब हो चुके थे।
हाजी इब्राहिम साहब ने मुड़ कर भी उनकी तरफ़ नहीं देखा। उन्होंने अपनी शरीक-ए-हयात, अमीना बेगम का लरज़ता हुआ हाथ अपने हाथ में लिया और अपने छोटे गोद लिए हुए बेटे के कुशादा और मोहब्बत भरे आँगन की तरफ़ क़दम बढ़ा दिए। वो घर छोटा ज़रूर था, मगर वहाँ दीवारों में नफ़रत के नहीं, बल्कि ख़ुलूस और एहतराम के दीये जलते थे।
कुछ अर्से बाद, इब्राहिम साहब की मशहूर किताब ‘वालिदैन, एक लावारिस साया’ पर मुल्क की एक नामवर यूनिवर्सिटी में सेमिनार मुनक़िद हुआ। स्टेज पर जब इब्राहिम साहब को मेहमान-ए-खुसूसी के तौर पर बुलाया गया, तो हॉल तालियों की गूंज से लरज़ उठा।
माइक के सामने खड़े हो कर जब उन्होंने अपनी भारी और पुरसुकून आवाज़ में बोलना शुरू किया, तो अल्फ़ाज़ किसी नश्तर की तरह दिलों को चीर रहे थे।
“औलाद दरख़्त की तरह होती है… माँ-बाप उसे अपने खून-ए-जिगर से सींचते हैं, उसे जवान करते हैं, उस पर फूल खिलने की उम्मीद लगाते हैं। लेकिन जब वही दरख़्त साया देने के क़ाबिल होता है, तो अफ़सोस कि कुछ शाखें इतनी ख़ुदग़र्ज़ हो जाती हैं कि जड़ों को ही काटने लगती हैं। याद रखिए, दौलत और शोहरत तो कमाई जा सकती है, मगर माँ-बाप की आह… इंसान को अंदर से खोखला कर देती है।”
सामईन की आँखें नम थीं और पूरा हॉल एहतराम में झुका हुआ था।
उधर शहर के एक गोशे में, तारिक़ और जुनैद अपने आलीशान घर के बड़े से ड्राइंग रूम में अकेले बैठे टेलीविज़न पर अपने बाप को देख रहे थे। स्क्रीन पर इब्राहिम साहब के चेहरे का वक़ार और नूर देख कर उन्हें यूँ लगा जैसे वो घर का कोई बड़ा ख़ज़ाना हमेशा-हमेशा के लिए खो चुके हैं।
अब घर में दौलत के ढेर थे, ऊँची दीवारें थीं, बड़ी गाड़ियाँ थीं,मगर उन दीवारों के बीचों-बीच सिर्फ़ एक सन्नाटा था… एक ऐसा गहरा सन्नाटा, जो किसी बाप की बददुआ की तरह उनके दिलों को अंदर ही अंदर दीमक की तरह चाट रहा था।
और यूॅं, इस कहानी का आख़री वरक़ सिसकते हुए ज़मीरों और बे-नाम पछतावे की स्याही पर हमेशा के लिए बंद हो गया।
यूनिवर्सिटी के बड़े ऑडिटोरियम में पंखों की मद्धम आवाज़ और हज़ारों लोगों के साँसों की सरगोशी के सिवा सन्नाटा छाया हुआ था। स्टेज की हल्लू-जल्लू रौशनी के दरमियान हाजी इब्राहिम साहब माइक के सामने खड़े थे।
उनकी सफेद दाढ़ी और पेशानी की झुर्रियाँ बताती थीं कि ज़िंदगी ने उन्हें कितने अच्छे से पढ़ाया था। उन्होंने माइक को थोड़ा सा अपनी तरफ़ झुकाया और हॉल में बैठे लोगों की तरफ़ देखा, जिनमें बूढ़े माँ-बाप भी थे और जवान औलाद भी।
हाजी साहब की आवाज़ में एक अजीब सा कपकपाहट भरा रुआँसापन था।आंखों में आंसुओं के मोती चमकने लगे थे,उन्होंने खुदको संभाला, मुझे यह जो ग़ज़ब की इज़्जत, यह जो शोहरत और यह माइक मिला है, लोग इसे मेरी कामयाबी कहते हैं। मगर कोई मुझसे पूछे कि इस कामयाबी की क़ीमत क्या चुकानी पड़ी है? तो मेरा दिल कहता है कि यह शानदार माइक… यह नाम-निहाद एज़ाज़, दरअस्ल मेरे उन सिसकियों का मर्सिया है जो मैंने अपने ही घर के बंद कमरों में अकेले रो रो कर कही थीं।”
पूरे हॉल में एक गहरी ख़ामोशी फैल गई। कई बुज़ुर्गों ने अपनी आँखें झुका लीं।
हाजी साहब ने अपनी नम आँखों से सामने बैठी जवान नस्ल की तरफ़ देखा और बोले,
“मैं आज यहाँ किसी को क़सूरवार ठहराने नहीं आया, बल्कि एक बाप की हैसियत से आप सब को… और ख़ुसूसन उन जवानों को जो अपने माँ-बाप को अपने घर का ‘बोझ’ समझते हैं… एक तनबीह, एक आख़री मशवरा देने आया हूँ।
जब हम बूढ़े होते हैं ना, तो हमें आपके बंगलों की, आपकी बड़ी गाड़ियों की या आपके बैंक बैलेंस की ज़रूरत नहीं होती। हमें सिर्फ़ एक नर्म लहजे की, एक शफ़क़त भरे हाथ की और दो वक़्त की उस रोटी की ज़रूरत होती है जो तानों के बग़ैर,प्लेट में रखी जाए। लेकिन अफसोस… जब औलाद जवान होती है, तो वो यह भूल जाती है कि जिस दरख़्त के साये में बैठ कर वो आज आसमान छू रहे हैं, उस दरख़्त की जड़ों को उनके ही बाप ने अपने खून-पसीने से सींचा था।”
हाजी साहब का गला भर आया। उन्होंने एक गहरा सांस लिया और अपने कपकपाहट भरे हाथ को सीने पर रखा,
“मैं आज उन तमाम माँ-बाप से भी कहूँगा जो अपनी औलाद की हर ग़लत फ़रमाइश पूरी करने के लिए ख़ुद को मिटा देते हैं… बच्चों को इतनी परवाज़ मत दीजिए कि वो ज़मीन पर बैठे अपने ही माँ-बाप को चींटी समझने लगें। औलाद को पढ़ाइए, लिखिए, इंसान बनाइए। लेकिन उन्हें इतना ख़ुदग़र्ज़ मत कीजिए कि वो बुढ़ापे में आपके आँसू पोंछने के बजाय आपका बटवारा करने लगें।”
हॉल में बैठी कई माओं की सिसकियाँ अब गूंजने लगी थीं। नौजवान सर झुकाए बैठे थे, जैसे ज़मीर का कोई बहुत भारी दरवाज़ा उनके अंदर खुल गया हो।
हाजी इब्राहिम साहब ने माइक से हटते हुए आख़री जुमला कहा, जो पत्थरों पर लकीर की तरह गहरे असरात छोड़ गया।
शोहरत का सूरज भी एक दिन ग़ुरूब हो जाता है। लेकिन याद रखिएगा… माँ-बाप की आहें इतनी असर रखती हैं कि बड़े-बड़े महलों को भी राख कर देती हैं। अपने घरों में माँ-बाप को बोझ नहीं, रहमत बना कर रखिए… इससे पहले कि बहुत देर हो जाए और आपके हाथ में सिर्फ़ पछतावे की राख बचे।”
जब वो स्टेज से नीचे उतरे, तो पूरा हॉल अपनी जगह पर खड़ा हो चुका था,ऐसा खड़ा जैसे एहतराम और शर्मिंदगी का समन्दर एक साथ उमड़ आया हो।

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।

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