कस्तूरी कुंडली बसे क्यों ढूंढे इत उत
तुम यूँ ही खिलो, मैं प्रीत बुनूँ,
भर आँचल में छवि तेरी चुनूँ।
तू हृदय में ही मेरे मोहन है बसा,
तुझे धड़कन में अपनी मैं गुनूँ।
तुझे पा के अधूरा न भाव रहे,
इस मन में न कोई अभाव रहे।
मैं तो जनम-जनम की मीरा हूँ ,
बस चरणों में ही यह झुकाव रहे।
— सविता सिंह मीरा
