अपना आंकलन, स्वयं करो
मैंने आज एक बात पर बड़ी गंभीरता से विचार किया कि लोग जैसा खुद को मेरे सामने प्रस्तुत करते हैं असल में वह पूरी तरह से वैसे होते नहीं और जैसी समझाइश मुझे मुफ्त में देते हैं वैसी समझाइश कि मुझे कुछ ख़ास जरूरत पड़ती नहीं।
उदाहरण कुछ ज्ञानी मुझे अक्सर मेरी खामियां गिनाते रहते हैं यहां तक कि मेरे उदार और मित्रतापूर्ण व्यवहार को मेरी मूर्खता बताते हैं और ज्ञान देते हैं कि मुझे खुद में सुधार कि जरूरत है।
जबकि वे खुद पर, अपने झगड़ालू, अड़ियल स्वाभाव पर इतराते हैं।
मेरा मन कई बार उन्हें जवाब देने का होता है पर हर बार बस ये सोचकर मैं चुप्पी साध लेती हूं कि शायद आज की दुनिया ऐसे लोगों कि ही है।
पर क्या ये वाकई सच है और है तो कितने प्रतिशत???
पता है मेरे जैसे बहुत लोग हैं जो जितनी बड़ी गलती करते नहीं उससे दोगुना बड़े गुनहगार बन जाते हैं।
जो ज्यादा संवेदनशील होते हैं, जिनका मन साफ और दूसरों को समझने वाला होता है अक्सर वही चोट ज्यादा खाते हैं।
खैर, चोट खाना शायद उतना बुरा नहीं जितना बुरा घायल बने रहना है।
मुझे बुरा बहुत जल्दी लगता है और रोना भी जल्दी आता है, मैं प्रतिक्रिया भी जल्दी करती हूं पर इन सबका अर्थ कमजोर या मूर्ख होना नहीं है, क्योंकि जिनके दिल में दिमाग नहीं होता वो दिल से ही सोचते हैं।
— अंकिता जैन अवनी
