एक दीप उनके लिए
आज गली-गली दीपों की पंक्ति सजी है,
आँगन में फिर खुशियों की धून बजी है ;
लेकिन मन के सूने कोने में इतनी गहरी
आज किसकी स्मृति आकर है ठहरी ?
मिट्टी के दीपक पल-पल जलते हैं,
सपनों में सबका मन मचलते हैं,
जिनके संग पहले यह पर्व मनाया,
अब वे चेहरे कहाँ देखने मिलते हैं?
माँ के हाथों की वह मिठास,
पिता का स्नेहिल वह आभास,
भाई-बहनों की वह हँसी पुरानी,
आज बना मन का मधुर विलास।
कुछ आँगन हैं अब सूने-सूने,
बहुत दूर हैं आज सभी अपने
किससे कहें हृदय की पीड़ा,
कौन आएगा अब मेरे निकट कौन जाने ?
एक दीप उन नामों का भी,
जो स्मृतियों में हैं जीवित ;
एक दीप उन स्वप्नों का भी,
जो अधूरे होकर भी हैं संचित ।
एक दीप उन आँखों का हो,
जो केवल अपनों की राह निहारें,
एक दीप उन हाथों का हो,
जो कठिन श्रम से जीवन सँवारें।
आज अमावस से कह दो इतना
मत करना मन को अन्धकार ;
जिनको समय छीन ले गया है दूर
उनका समर्पित यह प्रेम का त्योहार।
दीप जलें तो ऐसे जलें कि
हर पीड़ा का हो जाए अवसान ;
किसी अकेले मन के भीतर,
न चले अकेलापन का घमासान।
— डा. सुव्रत दे
