कविता

समय का जीवन

समय बड़ी जल्दी
उम्रदराज़ हो जाता है।
भोर में वह किसी नवजात
स्वप्न की तरह आँखें खोलता है
कोमल, कमसिन,ओस में
भीगी कच्ची कली-सा।

फिर धीरे-धीरे सूरज उसके कंधों पर
जिम्मेदारियों का आकाश रख देता है।
वह चलता है तपती धूप में भी,
बिना शिकायत,जैसे कोई जवान
अपने हिस्से का युद्ध
पूरी शक्ति से लड़ रहा हो।

दोपहर तक समय के चेहरे पर
अनुभव की रेखाएँ उतरने लगती हैं।
जो सुबह तक सपना था,
वह अब जीवन का यथार्थ है।

और फिर साँझ में समय एक गृहिणी-सा
दिन भर की थकान समेटकर
देहरी पर खड़ा मिलता है
पाँव थके हुए, कंधे बोझिल,
पर होंठों पर मुस्कान।

शायद जीवन की सबसे बड़ी विडंबना
यही है कि थक जाने के बाद भी
मनुष्य मुस्कुराना नहीं छोड़ता।

और रात होते ही वही समय
अचानक बूढ़ा हो जाता है।

खामोश…निःशब्द…जैसे कोई अधेड़
अपनी खाट पर लेटा दिन भर का हिसाब
बिना किसी से कहे मन ही मन करता हो।

एक ही दिन में समय हमें
जन्म से वृद्धावस्था तक ले जाता है।

तभी तो लगता है समय गुजरता नहीं,
हम गुजरते हैं।

घड़ी की सुइयाँ केवल अपनी
जगह बदलती हैं, पर उनके साथ
हमारी उम्र, हमारे स्वप्न,हमारे संबंध
और अंततः हम स्वयं
थोड़े-थोड़े कम होते जाते हैं।

समय की सबसे बड़ी सच्चाई शायद यही है
वह कभी बूढ़ा नहीं होता, बूढ़े तो हम होते हैं;
वह केवल हर दिन हमें हमारा एक दिन
कम करके हमारी पूरी उम्र का
अर्थ समझाता रहता है।

— सविता सिंह ‘मीरा’

*सविता सिंह 'मीरा'

जन्म तिथि -23 सितंबर शिक्षा- स्नातकोत्तर साहित्यिक गतिविधियां - विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित व्यवसाय - निजी संस्थान में कार्यरत झारखंड जमशेदपुर संपर्क संख्या - 9430776517 ई - मेल - meerajsr2309@gmail.com

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