युवा पीढ़ी की छटपटाहट,रामलीला मैदान से एक वैचारिक मंथन
दिल्ली का रामलीला मैदान भारतीय राजनीतिक इतिहास का वह मूक साक्षी रहा है, जिसने सत्ता के अहंकार को भी कई बार झकझोरा है। आज इस मैदान की सरज़मीन पर जो राजनीतिक परिदृश्य उभर रहा है, वह महज़ कुछ लोगों का जमावड़ा नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के भीतर सुलगती आकांक्षाओं, असंतोष और बदलाव की छटपटाहट का जीवंत दस्तावेज है।
1. सत्ता की देहरी और सरकार की गंभीरता,संशय और संवादहीनता
जब भी रामलीला मैदान या किसी अन्य बड़े मंच से जनता की आवाज बुलंद होती है, तो सत्ता के गलियारों में सबसे पहली प्रतिक्रिया ‘असुरक्षा’ और ‘नजरअंदाज करने की प्रवृत्ति’ की होती है।
गंभीरता का संकट, इस सम्बन्ध में सामयिक सरकारों का रवैया अक्सर मुद्दों की गहराई में जाने के बजाय उन्हें राजनीतिक चश्मे से देखने का रहा है। जब युवा या आम नागरिक सड़कों पर उतरते हैं, तो प्रशासन का शुरुआती फोकस अक्सर उस आंदोलन को मैनेज करने या उसकी वैधता पर सवाल उठाने पर होता है, न कि उसकी मूल शिकायतों का समाधान करने पर।
बयानबाजी बनाम ज़मीनी यथार्थ, पक्ष और विपक्ष के बीच चल रहे कटाक्ष, आरोप-प्रत्यारोप और तीखे बयान केवल मीडिया की टीआरपी या अख़बारों के कॉलम भरने का काम करते हैं। इससे जनता के मूल मुद्दे चाहे वह रोजगार की अनिश्चितता हो, आर्थिक असमानता या अधिकारों का हनन नीतिगत बहसों के नेपथ्य (पर्दे के पीछे) में चले जाते हैं।
2. जेन-जी (Gen Z), डिजिटल क्रांति से ज़मीनी हलचल तक का सफ़र,
इस पूरे आंदोलन का सबसे अनूठा और क्रांतिकारी पहलू है जेन-जी की सक्रिय भागीदारी। डिजिट्ल युग में पली-बढ़ी यह पीढ़ी पारंपरिक राजनीति के सांचे में आसानी से फ़िट नहीं बैठती।
आवेश और तकनीकी दक्षता,यह पीढ़ी एक तरफ़ सोशल मीडिया के एल्गोरिदम को अपने पक्ष में मोड़कर किसी भी मुद्दे को रातों-रात राष्ट्रीय ट्रेंड बना देती है, तो दूसरी ओर रामलीला मैदान जैसी जगहों पर शारीरिक रूप से उपस्थित होकर अपनी प्रतिबद्धता भी दिखाती है।
स्थायित्व की चुनौती,सवाल यह है कि क्या यह उत्साह लंबा टिकेगा? जेन-जी की कार्यशैली में त्वरित परिणाम की प्रवृत्ति होती है। यदि आंदोलन लंबी खींचतान में बदलते हैं और ठोस वैचारिक या सांगठनिक नेतृत्व का अभाव रहता है, तो यह ऊर्जा धीरे-धीरे मंद पड़ सकती है।
अमिट छाप, भले ही तात्कालिक उत्साह कम हो जाए, लेकिन इस पीढ़ी ने यह साबित कर दिया है कि वे केवल दर्शक या उपभोक्ता नहीं हैं, बल्कि वे व्यवस्था से सवाल करना और उसे असहज़ करना अच्छी तरह जानते हैं।
3. क्या जिंदगी सचमुच अपनी पुरानी रफ़्तार पर लौट जाएगी?
यह एक बेहद कड़वा लेकिन सच सवाल है। इतिहास गवाह है कि,
आंदोलनों का चक्र,रामलीला मैदान में टेंट उखड़ने के बाद, लाउडस्पीकर बंद होने के बाद और मीडिया की नज़रें हटने के बाद, एक अजीब सी ख़ामोशी छा जाती है। सत्ता में बैठे लोग अपने दफ़्तरों में और आम आदमी अपनी रोज़मर्रा की जद्दोजहद (रोजी-रोटी के संघर्ष) में वापस लौट जाता है।
कुर्सियों की खामोशी,नीति-निर्माताओं की कुर्सियां कुछ समय के हंगामे के बाद फ़िर से अपने रूटीन प्रशासनिक चक्र में चली जाती हैं। वादों की फ़ाइलें धूल फांकने लगती हैं, और ज़िंदगी उसी पुरानी, थका देने वाली रफ़्तार पर दौड़ने लगती है।
4.नेपथ्य में गए मुद्दे और लोकतंत्र की अंतर्निहित शक्ति,
तो क्या इस सबका कोई परिणाम नहीं निकलता? क्या यह सब व्यर्थ है? इसका उत्तर ‘नहीं’ है।
अख़बारों की सुर्खियां भले ही बदल जाएं, पक्ष-विपक्ष के कटाक्ष भले ही हास्य और व्यंग्य बनकर सिमट जाएं, लेकिन रामलीला मैदान की रेती पर पड़े हर एक क़दम के निशान देश के राजनीतिक पटल पर एक वैचारिक लकीर खींच जाते हैं। यह प्रक्रिया भले ही धीमी हो, और कुर्सियां भले ही कुछ समय के लिए सुस्त पड़ जाएं, लेकिन यह तय है कि लोकतंत्र में जनता की बेचैनी को बहुत लंबे समय तक नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता। आज का यह उत्साह कल के बड़े राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन की नींव बनता है।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
