पर्यावरण

कभी शुद्ध हवा की पहचान थे गांव, आज प्रदूषण की चपेट में

एक समय था जब गांवों का नाम लेते ही मन में हरे-भरे खेतों, पेड़ों की ठंडी छाया, खुले आसमान, स्वच्छ जल और शुद्ध हवा की तस्वीर उभरती थी। गांवों की सुबह पक्षियों की चहचहाहट और ताजी हवा के झोंकों के साथ शुरू होती थी। लोग शहरों की भीड़, धुएं और प्रदूषण से दूर रहने के लिए गांवों का रुख करते थे। लेकिन आज परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं। पंजाब के गांव भी वायु प्रदूषण की गंभीर समस्या से अछूते नहीं रहे। कभी स्वच्छ वातावरण की पहचान रहे गांवों की हवा में भी अब धुआं, धूल और जहरीले कण घुलने लगे हैं।

पंजाब में वायु प्रदूषण बढ़ने के कई कारण हैं। इनमें पराली जलाना एक प्रमुख कारण है, विशेषकर धान की कटाई के बाद अक्टूबर और नवंबर के महीनों में। खेतों में फसल अवशेष जलाने से निकलने वाला धुआं आसपास के गांवों और कस्बों तक फैल जाता है। इससे हवा में सूक्ष्म कणों की मात्रा बढ़ती है, जो सांस के साथ शरीर में प्रवेश कर स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं।

हालांकि, प्रदूषण के लिए केवल पराली जलाना ही जिम्मेदार नहीं है। गांवों में बढ़ते वाहन, डीजल से चलने वाली मशीनें, ईंट-भट्ठे, निर्माण कार्य, सड़कों की धूल, कचरा जलाना और घरेलू ईंधन का धुआं भी वायु गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। खेतों में कीटनाशकों और रासायनिक पदार्थों का अनियंत्रित उपयोग भी पर्यावरण संबंधी चिंताएं बढ़ाता है।

आज गांवों में भी बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं को सांस संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। प्रदूषित हवा से खांसी, आंखों में जलन, एलर्जी, अस्थमा और हृदय संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। लंबे समय तक प्रदूषित वातावरण में रहने से फेफड़ों और हृदय के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। विशेष रूप से छोटे बच्चों के विकसित होते फेफड़ों और बुजुर्गों के कमजोर स्वास्थ्य पर इसका अधिक असर पड़ता है।

इस समस्या का एक चिंताजनक पहलू यह भी है कि गांवों में प्रदूषण की निगरानी और जागरूकता का स्तर अक्सर शहरों की तुलना में कम होता है। अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता मापने वाले उपकरण उपलब्ध नहीं हैं। परिणामस्वरूप लोगों को यह पता ही नहीं चलता कि जिस हवा में वे सांस ले रहे हैं, वह कितनी प्रदूषित है।

इस संकट से निपटने के लिए किसानों को दोषी ठहराने के बजाय उन्हें व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध कराने की आवश्यकता है। पराली प्रबंधन के लिए हैप्पी सीडर, सुपर सीडर, बेलर और अन्य कृषि मशीनों को सुलभ बनाया जाना चाहिए। फसल अवशेषों से जैविक खाद, बायोगैस और अन्य उपयोगी उत्पाद तैयार करने की व्यवस्था विकसित की जा सकती है। किसानों को उचित आर्थिक सहायता और तकनीकी मार्गदर्शन भी मिलना चाहिए।

गांवों में पेड़ों की संख्या बढ़ाना, सामुदायिक वन विकसित करना, सड़कों के किनारे हरियाली लगाना और तालाबों तथा प्राकृतिक जल स्रोतों का संरक्षण करना भी जरूरी है। इसके साथ ही कचरा और प्लास्टिक जलाने पर रोक लगनी चाहिए। स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देना तथा ईंट-भट्ठों और औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले धुएं पर प्रभावी नियंत्रण आवश्यक है।

स्कूलों और पंचायतों की इस अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। विद्यार्थियों को पर्यावरण संरक्षण से जोड़कर जागरूकता रैलियां, पौधारोपण अभियान और स्वच्छ हवा संबंधी कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए। प्रत्येक गांव में वायु प्रदूषण की नियमित निगरानी और स्थानीय स्तर पर पर्यावरण समितियों का गठन उपयोगी साबित हो सकता है।

सरकार, पंचायतों, किसानों, वैज्ञानिकों और आम नागरिकों को मिलकर इस दिशा में काम करना होगा। स्वच्छ हवा केवल शहरों की समस्या नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का अधिकार और आवश्यकता है।

हमें याद रखना चाहिए कि गांव केवल कृषि उत्पादन के केंद्र नहीं हैं, बल्कि वे हमारी संस्कृति, प्रकृति और जीवन का आधार भी हैं। यदि गांवों की हवा ही प्रदूषित हो गई तो स्वस्थ समाज और सुरक्षित भविष्य की कल्पना अधूरी रह जाएगी। समय आ गया है कि हम गांवों को फिर से स्वच्छ हवा, हरियाली और प्राकृतिक सुंदरता की पहचान बनाएं, क्योंकि स्वच्छ हवा कोई विलासिता नहीं, बल्कि जीवन की सबसे बुनियादी जरूरत है।

— डॉ. विजय गर्ग

डॉ. विजय कुमार सिंघल

नाम - डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’ जन्म तिथि - 27 अक्तूबर, 1959 जन्म स्थान - गाँव - दघेंटा, विकास खंड - बल्देव, जिला - मथुरा (उ.प्र.) पिता - स्व. श्री छेदा लाल अग्रवाल माता - स्व. श्रीमती शीला देवी पितामह - स्व. श्री चिन्तामणि जी सिंघल ज्येष्ठ पितामह - स्व. स्वामी शंकरानन्द सरस्वती जी महाराज शिक्षा - एम.स्टेट., एम.फिल. (कम्प्यूटर विज्ञान), सीएआईआईबी पुरस्कार - जापान के एक सरकारी संस्थान द्वारा कम्प्यूटरीकरण विषय पर आयोजित विश्व-स्तरीय निबंध प्रतियोगिता में विजयी होने पर पुरस्कार ग्रहण करने हेतु जापान यात्रा, जहाँ गोल्ड कप द्वारा सम्मानित। इसके अतिरिक्त अनेक निबंध प्रतियोगिताओं में पुरस्कृत। आजीविका - इलाहाबाद बैंक, डीआरएस, मंडलीय कार्यालय, लखनऊ में मुख्य प्रबंधक (सूचना प्रौद्योगिकी) के पद से अवकाशप्राप्त। लेखन - कम्प्यूटर से सम्बंधित विषयों पर 80 पुस्तकें लिखित, जिनमें से 75 प्रकाशित। अन्य प्रकाशित पुस्तकें- वैदिक गीता, सरस भजन संग्रह, स्वास्थ्य रहस्य। अनेक लेख, कविताएँ, कहानियाँ, व्यंग्य, कार्टून आदि यत्र-तत्र प्रकाशित। महाभारत पर आधारित लघु उपन्यास ‘शान्तिदूत’ वेबसाइट पर प्रकाशित। आत्मकथा - प्रथम भाग (मुर्गे की तीसरी टाँग), द्वितीय भाग (दो नम्बर का आदमी) एवं तृतीय भाग (एक नजर पीछे की ओर) प्रकाशित। आत्मकथा का चतुर्थ भाग (महाशून्य की ओर) प्रकाशनाधीन। प्रकाशन- वेब पत्रिका ‘जय विजय’ मासिक का नियमित सम्पादन एवं प्रकाशन, वेबसाइट- www.jayvijay.co, ई-मेल: jayvijaymail@gmail.com, प्राकृतिक चिकित्सक एवं योगाचार्य सम्पर्क सूत्र - 15, सरयू विहार फेज 2, निकट बसन्त विहार, कमला नगर, आगरा-282005 (उप्र), मो. 9919997596, ई-मेल- vijayks@rediffmail.com, vijaysinghal27@gmail.com

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