कविता
मोहब्बत का सफ़र भी कितना अजीब होता है,
ना कोई राह दिखाता है, ना कोई पास होता है,
जिसे चाहा था हमने अपनी जान से भी ज्यादा,
आज वही शफ़्क़त का चिराग किसी और के घर में जलता है।
दिल के अरमान दिल ही में सिमट कर रह गए,
हम तो वफ़ा की उम्मीद में ताउम्र तड़पते रह गए,
वो आए भी ज़िंदगी में तो सिर्फ़ एक झोंके की तरह,
और हम रात भर ढलती मोमबत्ती की तरह पिघलते रह गए।
अब तो रातों के सन्नाटे में बस ख़ामोशी बोलती है,
हर पुरानी याद सीने में नया दर्द खोलती है,
हम मुस्कुरा भी लें तो आँखें बयां कर देती हैं सब,
कि ये दुनिया जिसे ख़ुशी समझती है, वो तो एक अधूरा सपना है।
— हेमंत सिंह कुशवाह
