ग़ज़ल
एक लड़की कि फिर खोजती रह गई,
क्या ख़ता है मेरी सोचती रह गई।
रोज़ दर की तरफ़ देखती रह गई,
एक कोठे पे वो नाचती रह गई।
रक्षा बंधन पे राखी लिए हाथ में ,
एक भाई को वो खोजती रह गई।
जिस्म के भूके थे सब यहां उनसे वो ,
थोड़ा सा प्यार भी मांगती रह गई।
गोद ख़ाली से तूफ़ान उठने लगे,
एक बच्चे को वो देखती रह गई।
जाने ख़ुद को कहां भूल आई है वो,
आज ख़ुद को कोई खोजती रह गई।
कोठे के आगे से गुज़री बारात को,
वो तवाइफ़ फ़क़त देखती रह गई।
ये मेरा जिस्म है या खिलौना कोई,
मुंसिफ़ों से वो ये पूछती रह गई।
जिस पे वो रंग लगवाने लाई थी वो,
ओढ़नी अश्कों से भीगती रह गई।
एक औरत है मुझ में कि देखो ज़रा,
इक तवाइफ़ कहीं चीख़ती रह गई।
अपनी धरती में वो कुछ नहीं बो सकी,
ग़ैर के पौदों को सींचती रह गई।
सिर्फ़ आहट सी दर पर हुई थी मगर,
आज वो रात भर जागती रह गई।
घर का नक़्शा बनाने चली थी मगर,
कुछ लकीरें ही वो खींचती रह गई।
— अरुण शर्मा साहिबाबादी
