फोटो फ्रेम
मेरे जन्मदिन पर,
आज से कई साल पहले,
आईं थीं तुम,
अपनी बहन जी के साथ,
उपहार लेकर…..मेरे लिए,
जो था एक “फोटो फ्रेम”,
लिखा था उसमें कुछ अंग्रेजी में,
किन्तु तब नहीं थी समझ… अंग्रेजी की,
पर कुछ तो समझा था मैं उस दिन… कि..,
कुछ तो है, तुम्हारे ह्रदय में…….मेरे लिए,
रिश्ते नहीं होते मोहताज….शब्दों के,
परन्तु शब्द भी जरूरी है…. आधार (शुरुआत) के लिए,
कि मैं हूँ तुम्हारा और तुम मेरी…,
वो शब्द कुछ ही दिन में निकले….. बहाने से,
क्योंकि सीधा कहना शायद ही हो पाता है…… प्रेम में,
उन्हीं बहानों से शुरू हो गई कहानी,
हमारे प्रेम की,
कहानी चलती रही और होता रहा….,
मेल-मिलाप…शब्दों का, भावनाओं का,
बंटता रहा सुख-दुख, पढ़ाई-लिखाई के साथ…,
लेकिन कभी मिल न सके हम-तुम,
यदि मिल जाते तो फिर क्यों होते दूर…. कभी,
याद है तुम्हें,
रूठ गई थीं तुम,
और मैंने तुम्हें चिढ़ाने के लिए…,
तुम्हें अपना “गणित” दे दिया था।
और एक दिन,
जब तुम फिर हो गई थी नाराज,
तो.. मैंने मांगी थी माफी,
हाथ पर “सारी” लिखकर,
“राजा साहब” के ट्यूशन में… याद होगा ना तुम्हें?
याद होगा ना तुम्हें,
07 जुलाई का वो दिन…..जब हुआ था,
हमारा आखिरी वार्तालाप….प्रेम से,
उसके बाद भी कई बार मिली तुम,
हुई बात,
पर ना थी…वो पहले जैसी बात, ना प्रेम,
अभी भी याद है बिल्कुल वैसे का वैसा,
कैसे मूंदीं जा सकतीं हैं आँखे…. स्मृतियों से,
जब भी देखता हूँ तुम्हें,
फिर हो जातीं हैं ताजा…. स्मृतियाँ,
तुम्हारा यूँ चला जाना मुझे आज भी नहीं होता सहन,
ना ही मुझको आया समझ,
और ना ही तुमने बताया आज तक,
कि…. तुमने क्यूँ बनाई दूरी,
प्रिय…तुम आज भी याद आती हो बहुत…. बहुत याद,
परन्तु याद ही तो कर सकता हूं,
और कर भी क्या सकता हूं,
तुम जो चली गई हो दूर…. इतनी दूर।।
प्रिय… आज तुम बहुत याद आई…..
