ग़ज़ल
बड़ों के कहीं अब सहारे नहीं है,
कि वे अब घरों में दुलारे नहीं है।
पता है सभी को यहीं से गुजरना,
समय के समझते इशारे नहीं है ।
किसे वे बताएँ जिगर से दुखी हैं,
कि खुद के लिए खुद हमारे नहीं है ।
लुटाते रहे नेह जिन पर सदा ही,
न समझे कि वो ही हमारे नहीं हैं ।
लगी चोट तो अब जरा संभले हैं,
मिलन के हसीं अब नजारे नहीं है ।
— भावना अरोड़ा ‘मिलन’
