गीतिका/ग़ज़ल

शहर में कहर हो गया है

शहर  में  धूपों  का कहर हो गया है
कहाँ  ढूँढें  छाँव  बेनजर हो गया है।

शहर  का  तासीर  गरम  हो  गया है
यहाँ  हरियाली  बेअसर  हो  गया है।

शहर का  सारा दरख़्त  कट  गया है
यहाँ का आवाम  बेखबर हो गया है।

शहर का चैन व शुकुन छीन  गया है
शहर का जर्रा-जर्रा जहर हो गया है।

शहर का शहर पूरा भवन हो गया है
शहर  से परिंदा  बहुत दूर हो गया है।

शहर में कलरव अब खत्म हो गया है
इंसान लापरवाह, मगरूर  हो गया है।

यहाँ  पूरा शहर कारखाना हो गया है
यह प्रदूषण अब तो नासूर हो गया है।

— अशोक पटेल  “आशु”

*अशोक पटेल 'आशु'

व्याख्याता-हिंदी मेघा धमतरी (छ ग) M-9827874578