मुक्तक/दोहा

मुक्तक

१.
क्या कहूं, क्या न कहूं सोचते रहता हूं।
मन ही मन से गुफ्तगू करते रहता हूं।
कौन आकर मुझे इस उलझन से निकलेगा,
बस दिन-रात इसी कैफियत में रहता हूं।

२.
जमाने को मुझसे काफी शिकायत है,
लोगों का हर दिन रहता शिकायत है।
मैं क्या गलतियां की है,का इल्म नहीं है मुझे,
बस दिन-रात सुनते रहता हूं ,यहां शिकायत है।

३.
मुश्किल वक्त में कोई साथ नहीं दिया।
हालातों को देखते हुए साथ नहीं दिया।
आज़ मैंने अपने गुनाहों को ख़ुद ही समझ गया हूं,
अब पता चला कि लोगों ने क्यों साथ नहीं दिया।

४.
जब मैं बुलंदी पर था तो दोस्तों की भरमार थी।
आनन्द और प्रसन्नता की खूब भरमार थी।
थोड़ी सी आहट, मेरे मुरझाने की लगीं मेरे दोस्तों को,
अज़ीज़ दोस्तों की आज़ खत्म होती भरमार थी।

५.
सफलता ने सपने सुहाने कर दिया।
भीड़भाड़ घर में आना-जाना कर दिया।
सोचता हूं कि कुछ मुश्किल वक्त भी आ सकता है,
दोस्तों से दूरियां बनाने का काम शुरू कर दिया।

— डॉ. अशोक

डॉ. अशोक कुमार शर्मा

पिता: स्व ० यू ०आर० शर्मा माता: स्व ० सहोदर देवी जन्म तिथि: ०७.०५.१९६० जन्मस्थान: जमशेदपुर शिक्षा: पीएचडी सम्प्रति: सेवानिवृत्त पदाधिकारी प्रकाशित कृतियां: क्षितिज - लघुकथा संग्रह, गुलदस्ता - लघुकथा संग्रह, गुलमोहर - लघुकथा संग्रह, शेफालिका - लघुकथा संग्रह, रजनीगंधा - लघुकथा संग्रह कालमेघ - लघुकथा संग्रह कुमुदिनी - लघुकथा संग्रह [ अन्तिम चरण में ] पक्षियों की एकता की शक्ति - बाल कहानी, चिंटू लोमड़ी की चालाकी - बाल कहानी, रियान कौआ की झूठी चाल - बाल कहानी, खरगोश की बुद्धिमत्ता ने शेर को सीख दी , बाल लघुकथाएं, सम्मान और पुरस्कार: काव्य गौरव सम्मान, साहित्य सेवा सम्मान, कविवर गोपाल सिंह नेपाली काव्य शिरोमणि अवार्ड, पत्राचार सम्पूर्ण: ४०१, ओम् निलय एपार्टमेंट, खेतान लेन, वेस्ट बोरिंग केनाल रोड, पटना -८००००१, बिहार। दूरभाष: ०६१२-२५५७३४७ ९००६२३८७७७ ईमेल - ashokelection2015@gmail.com