मुक्तक
१.
क्या कहूं, क्या न कहूं सोचते रहता हूं।
मन ही मन से गुफ्तगू करते रहता हूं।
कौन आकर मुझे इस उलझन से निकलेगा,
बस दिन-रात इसी कैफियत में रहता हूं।
२.
जमाने को मुझसे काफी शिकायत है,
लोगों का हर दिन रहता शिकायत है।
मैं क्या गलतियां की है,का इल्म नहीं है मुझे,
बस दिन-रात सुनते रहता हूं ,यहां शिकायत है।
३.
मुश्किल वक्त में कोई साथ नहीं दिया।
हालातों को देखते हुए साथ नहीं दिया।
आज़ मैंने अपने गुनाहों को ख़ुद ही समझ गया हूं,
अब पता चला कि लोगों ने क्यों साथ नहीं दिया।
४.
जब मैं बुलंदी पर था तो दोस्तों की भरमार थी।
आनन्द और प्रसन्नता की खूब भरमार थी।
थोड़ी सी आहट, मेरे मुरझाने की लगीं मेरे दोस्तों को,
अज़ीज़ दोस्तों की आज़ खत्म होती भरमार थी।
५.
सफलता ने सपने सुहाने कर दिया।
भीड़भाड़ घर में आना-जाना कर दिया।
सोचता हूं कि कुछ मुश्किल वक्त भी आ सकता है,
दोस्तों से दूरियां बनाने का काम शुरू कर दिया।
— डॉ. अशोक
